Friday, August 28, 2009

बिरहन

खोयीसी बिरहन जब
उस ऊँचे टीलेपे
सूने महल के नीचे
या फिर खंडहर के पीछे
गीत मिलन के गाती है,
पत्थर दिल रूह भी
फूट फूट के रोती है।
हर वफ़ा शर्माती है,
जब गीत वफ़ाके सुनती है....

खेतोमे,खालिहानोमे,
अंधेरोंमे याकि,
चाँदनी रातों में ,
सूखे तालाब के परे,
या नदियाकी मौजोंपे
कभी जंगल पहाडोंमे.....

मीलों फैले रेगिस्तानोमे
या सागरकी लहरोंपे
जब उसकी आवाज़
लहराती है,
हर लेहेर थम जाती है,
बिजलियाँ बदरीमे
छुप जाती हैं.....

हर तरफ खामोशी ही
खामोशी सुनायी देती है।
मेरी दादी कहती है
सुनी थी ये आवाज़ें,
उनकीभी दादीने...

9 comments:

एकलव्य said...

बिरहन तो दिल को छू गई शमाजी सुन्दर रचना

योगेश स्वप्न said...

wah, birhan ji, sorry shamaji, ha ha,

bahut sunder rachna, koi purani film jaise bees saal baad yaad aa gai.

चंदन कुमार झा said...

सुन्दर रचना के लिये बधाई.

मुकेश कुमार तिवारी said...

शमा जी,

बहुत खूबसूरत अंदाज है, कविता बिरहन के बहाने अपने अंतर समाने लगाती है और ऐसी ही कई आवाजें गूंजने लगती है जो मेरे पहले भी सुनी गई हैं और आज भी सुनी जा रही हैं।

एक बड़ा मौजूं शे’र याद आया है शायद मुक्क्मिल ना भी हो :-

जाने क्या कह दिया इन डूबने वालों ने लहरों से
ये आज भी सिर मारती.. फिरती हैं साहिल पर

सादर,

मुकेश कुमार तिवारी

वन्दना अवस्थी दुबे said...

हर तरफ खामोशी ही
खामोशी सुनायी देती है।
मेरी दादी कहती है
सुनी थी ये आवाज़ें,
उनकीभी दादीने...
बहुत सुनर रचना. हमेशा की तरह.

विनय ‘नज़र’ said...

बहुत ख़ूब
---
तख़लीक़-ए-नज़र

ktheLeo said...

विरह वेदना के मनोभावो का सुन्दर चित्रण.

निर्झर'नीर said...

aapko bahot din baad padha ..nice sundar abhivyakti

RAJ SAGAR said...

SOCHA THAAA IS DUNIA MEIN HUMI HEE NAHI RAHO MEIN AUR BHI HAI

"BAHUT KHOOB JANAB

RAJ SAGAR