Wednesday, August 19, 2009

शमा, अपनेही मज़ारकी.....

रुसवाईयों से कितना डरें, के,
डर के सायेमे जीते हैं हम !
या कि रोज़ मरते हैं हम ?
लिख डाला आपने दीवारों तकपे,
उसे तो मिटाभी सकते हैं हम...
आख़िर कबतक यही करेंगे हम?
डरके ही सायेमे दम तोडेंगे हम?
ये रौशनी नही उधारकी,
सदियोंसे अपनेही मज़ारपे,
जलते हुए चराग हैं हम....

जो दाग ,दामने दिलपे मिले,
वो मरकेभी न मिटा पाएँगे,
सोचते हैं, मूँदके अपनी आँखे,
काश! ये होता,वो ना होता,
गर ऐसा होता तो कैसा रहता....
जब कुछ नही बदल सकते हैं हम,
हरपल डरके सायेमे रहते हैं हम.....

बचीं हैं चंद आखरी साँसे,
अब तो हटा लो अपने साए ,
के कबसे तबाह हो चुके हैं हम....
याद रखना, गर निकलेगी हाय,
खुदही मिट जायेंगे आप,
बून्दभी पानीकी न होगी नसीब,
इसतरह तड़प जायेंगे आप,
डरके साए बन जायेंगे हम...

वैसे तो मिट ही चुके हैं,
हमें मिटानेकी तरकीबें करते,
क्या करें, कि, अपने गिरेबाँ मे
झाँक नही सकते हो तुम?
सब्रकी इन्तेहा हो गयी है,
अब खबरदार हो जाओ तुम,
पीठ मे नही, ख़ंजर,अब,
सीनेमे पार कर सकते हैं हम,
कबतक डरके रह सकते हैं हम?
अपनेही मज़ारका दिया हैं हम...

12 comments:

विपिन बिहारी गोयल said...

डर के सायेमे जीते हैं हम !
या कि रोज़ मरते हैं हम ?

bahut bahut khoob

ओम आर्य said...

पीठ मे नही, ख़ंजर,अब,
सीनेमे पार कर सकते हैं हम,
कबतक डरके रह सकते हैं हम?
अपनेही मज़ारका दिया हैं हम...
bahut hi sundar bhaw hai aapki rachana ki ...........bahut bahut badhaaee

renu ahuja said...

bahut sunder ,
kabhi kabhi meenaa kumari ki hi trah dard kaa ahsaas aur kabhi silsila picture ke geet kaa ahsaas ki tum hoti to aisaa hotaa, tum hoti to waisaa hotaa.........aapkey likhney kaa ye milaa julaa ye andaaz kaafi achaa hai is nazam me.

likhtey rahen ....bahut badhaayi.
-renu ahuja
www.kavyagagan.blogspot.com

योगेश स्वप्न said...

अब खबरदार हो जाओ तुम,
पीठ मे नही, ख़ंजर,अब,
सीनेमे पार कर सकते हैं हम,
कबतक डरके रह सकते हैं हम?
अपनेही मज़ारका दिया हैं हम...

BAHUT KHOOB HIMMAT BADHATI SUNDER ABHIVYAKTI.

योगेश स्वप्न said...

अब खबरदार हो जाओ तुम,
पीठ मे नही, ख़ंजर,अब,
सीनेमे पार कर सकते हैं हम,
कबतक डरके रह सकते हैं हम?
अपनेही मज़ारका दिया हैं हम...

BAHUT KHOOB HIMMAT BADHATI SUNDER ABHIVYAKTI.

KNKAYASTHA "नीरज" said...

शमा जी,
आपकी कविता बड़ी बहव पूर्ण है लेकिन इतनी मायूसी क्यूँ...इतनी शिकायत क्यों...जीवन में कठिनाइयाँ और रुस्वियाँ तो आती-जाती रहती हैं,,,इनसे बचा नहीं जा सकता और मायूस हो इस प्रकार रुका भी नहीं जा सकता...

shama said...

नीरज जी ,
ये रचना तो मायूसी के परे है ..कि अब बहुत हो गया डरना ..सामने तो आओ पीछे से वार करने वालों....के अब कोई डर नही ..!

चंदन कुमार झा said...

कबतक डरके रह सकते हैं हम?
अपनेही मज़ारका दिया हैं हम..


बहुत ही अच्छी लगी रचना. सुन्दर अभिव्यक्ति. आभार.

मुकेश कुमार तिवारी said...

शमा जी,

अपनी बात बेबाकी से कहती हुई रचना खबरदार कर रही है कि ड़र के साये बहुते हो चुके यह वक्त है दो-दो हाथ करने का/मुकाबिल होने का।

साहस भरी पंक्तियाँ, जोश भरे अहसास।

सादर,


मुकेश कुमार तिवारी

ज्योति सिंह said...

bahut hi shaandar .

Vikas Mogha said...

ati uttam abhivyakti
जब कुछ नही बदल सकते हैं हम,
हरपल डरके सायेमे रहते हैं हम

Vikas Mogha said...

ati uttam abhivyakti
जब कुछ नही बदल सकते हैं हम,
हरपल डरके सायेमे रहते हैं हम