Friday, June 19, 2009

एक बगिया बनाएँ...

जब एक बूँद नूरकी,
भोलेसे चेहरे पे किसी,
धीरेसे है टपकती ,
दो पंखुडियाँ नाज़ुक-सी,
मुसकाती हैं होटोंकी,
वही तो कविता कहलाती!

क्यों हम उसे गुनगुनाते नही?
क्यों बाहोंमे झुलाते नही?
क्यों देते हैं घोंट गला?
करतें हैं गुनाह ऐसा?
जो काबिले माफी नही?
फाँसी के फँदेके सिवा इसकी,
दूसरी कोई सज़ा नही??

किससे छुपाते हैं ये करतूते,
अस्तित्व जिसका चराचर मे,
वो हमारा पालनहार,
वो हमारा सर्जनहार,
कुछभी छुपता है उससे??
देखता हजारों आँखों से!!
क्या सचमे हम समझ नही पाते?

आओ, एक बगीचा बनायें,
जिसमे ये नन्हीं कलियाँ खिलाएँ,
इन्हें स्नेह्से नेहलायें,
महकेगी जिससे ज़िंदगी हमारी,
महक उठेगी दुनियाँ सारी...
मत असमय चुन लेना,
इन्हें फूलने देना,
एक दिन आयेगा ऐसा,
जब नाज़ करोगे इन कलियोंका......"

2 टिप्पणियाँ:

mark rai ने कहा…

एक बगीचा बनायें,
जिसमे ये नन्हीं कलियाँ खिलाएँ,
इन्हें स्नेह्से नेहलायें......
beautiful thinking

Mrs. Asha Joglekar ने कहा…

इन्हें स्नेह्से नेहलायें,
महकेगी जिससे ज़िंदगी हमारी,
महक उठेगी दुनियाँ सारी...
Sunder.

2 comments:

डा.राष्ट्रप्रेमी said...

किससे छुपाते हैं ये करतूते,
अस्तित्व जिसका चराचर मे,
वो हमारा पालनहार,
वो हमारा सर्जनहार,
कुछभी छुपता है उससे??
देखता हजारों आँखों से!!
क्या सचमे हम समझ नही पाते?
शमा जी वास्तविकता तो यही है कि किसी को ईश्वर पर विश्वास नहीं, कम से कम मुझे ऐसा व्यक्ति नहीं मिला जो सच के साथ जीने का साहस रखता हो. ईश्वर के नाम से तो हम केवल अपने स्वार्थों को पूरा करते हैं. हमारे व्यवहार से तो यही लगता है ईश्वर अन्धा, बहरा, रिश्वतखोर और नम्बर एक का चाप्लूस है. हां जीवन यात्रा में कहीं आपको कोई ऐसा शख्स मिले जो करता है वह कहता भी है, तो कृपया उसका नाम अवश्य बतायें.
www.rashtrapremi.com

नीरज कुमार said...

जब एक बूँद नूरकी,
भोलेसे चेहरे पे किसी,
धीरेसे है टपकती ,
दो पंखुडियाँ नाज़ुक-सी,
मुसकाती हैं होटोंकी,
वही तो कविता कहलाती!

क्या परिभाषा है कविता की...