Thursday, June 4, 2009

"शमा"को बुझाके..!

अभी, अभी, नेहलाये गए हैं,
सफ़ेद कपडेमे लपेटे गए हैं,
लगता है, मारे गए हैं,
हमें पत्थरोंसे मारनेवालें,
हमपे फूल चढा रहे हैं....
जीते जी हमपे हँसनेवाले,
सर रख क़दमोंपे हमारे,
जारोज़ार रोये जा रहे हैं........
इस "शमा"को बुझाके,
एक और शमा जला रहे हैं....
हमारी परछाईसे डरनेवाले,
क्यों हमें लिपट रहे हैं?
बेशक, हम लाशमे,
तबदील किए जा चुके हैं......
ये क्या तमाशा है?
ऐसा क्यों कर रहे हैं??
शमा
गर्दूं-गाफिल ने कहा…

शमा जी
आज आपके कविता वाले ब्लॉग पर आया
यहाँ भी आपको उतना ही दर्दमंद पाया



जो मौत देख पाते हैं
वही जिंदगी निबाहते हैं

यही है सच जीवन का
जो मर के देख पाते हैं

जिसने जी ली मौत जीते जी
वो फरिश्तों में बदल जाते हैं

गाफिल जी ने ये टिप्पणी "एक 'शमा'को बुझाके..." इस कविता पे दी थी...बोहोत ही सुंदर लगी, इसलिए अपने पाठकों के खातिर ब्लॉग पे पोस्ट कर दी...!
मोहन वशिष्‍ठ said...

यही है सच जीवन का
जो मर के देख पाते हैं

जिसने जी ली मौत जीते जी
वो फरिश्तों में बदल जाते हैं

बहुत बहुत बहुत ही सुंदर है आभार इसे हम सब के साथ सांझा करने के लिए शमां जी

SWAPN said...

जो मौत देख पाते हैं
वही जिंदगी निबाहते हैं

यही है सच जीवन का
जो मर के देख पाते हैं

जिसने जी ली मौत जीते जी
वो फरिश्तों में बदल जाते हैं

ek purna anubhavi vyakti hi likh sakta hai, uprokt panktian , mujhe behad umda lagin , gafil ji ko meri or se dheron badhaai pahunchayen.

मैंने अपनी कविता दोबारा सन्दर्भ के खातिर, उनकी टिप्पणी के ऊपर पोस्ट कर दी है!

2 comments:

विनय said...

बेहद ख़ूबसूरत अंदाज़े-बयाँ

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चाँद, बादल और शाम

Shama said...

मिला आराम, हुआ महसूस, अकेले नही,
जब इक 'गाफिल'-सी ग़ज़ल साथ चली!