Saturday, May 23, 2009

सफ़र का सच!

इन सब आफ़सानों में,शामिल कुछ ख्याब हमारे होते,
हम अगर टूट ना जाते तो शायद  सितारे होते।

तमाम कोशिशें मनाने की बेकार गयीं,
वो अगर रुठ ना जाते तो हमारे होते।

तूंफ़ां खुद मुसाफ़िर था कश्ती  में मेरी,
मुश्किलें पतवार थीं,वरना हम भी किनारे होतें। 

4 comments:

SWAPN said...

toofan khud............. kinare hote.

bahut khoob, nirala andaz-e-bayan.

Shama said...

Ye rachnaa meree nahee...ye "LEO" jee kee hai, jinhen maine, mere "kavita" blog pe likhneke liye aamantrit kiyaa thaa...unkaa naam kyon nahee aayaa ye nahee samajh paayee...jabki, unhon ne swayam hee ise, apne blog parse mere blogpe daalaa hai!

Beshaq, rachnaa gazab kee hai...theek kaha"SWAPN" ne.."anadaaze bayaan, niraalaa"...ye andaaze bayaan meraa nahee...!
Mai itnaa sundar shayad, zindageebhar, kavitaake roopme likh naa paaoon!

ktheLeo said...

स्वप्न जी,
धन्यवाद!शुक्रिया!नवाज़िश।
हुस्ने नज़र है आप का वरना अन्दाज़े बयां तो एक दम आम है,I mean सीधे दिल से और सच सच!

ktheLeo said...

शमा जी,
मेरा नाम वहीं है जहां उसे होना था,आप निश्चितं रहें।
रचना किसी एक इन्सान की नहीं हो्ती,गर हो्ती तो हम लिख कर इस फ़िराक में क्यॊं रह्ते के कोई उसे पढे।
मानि के हर रचना ,एक नूरानी पैगाम है जिसे देने का हम सब माध्यम(ज़रिया/Medium) भर होते हैं।
हम में से हर एक इस काबलियत को निखारने और दिखाने का हकदार है, और पूरी सलाहियत रखता है, ज़रूरत है तो थोडी तसल्ली और रियाज़ की।
Happy Bolgging|
Keep reading and writing|