Saturday, May 2, 2009

बेआबरू हुए...

बोहोत बेआबरू हुए,
निकाला उसने दिलसे,
घरभी वही रहा,
दरभी वही रहा,
बंद हुए दरवाज़े
उनके दिलके...
बेआबरू होके निकले...

पूछते हैं पता हमसे,
रहती हो किस शेहेरमे,
घर है तुम्हारा,
किस कूचे, किस गलीमे,
क्या बताएँ उनसे,
के ये ठिकाने नही हमारे?
रहे हैं बेआबरू होके...

जो छत है सिरपे,
कहते हैं,कि ये ,
दरो दीवारें, सबपे,
लिखे हैं नाम उन्ही के,
इक कोनाभी नही हमारा,
हैं, ग़रीब, आश्रित उन्हीके...
बेआबरू होके निकले हैं...

11 comments:

SWAPN said...

BAHUT KHOOB.

डा.रूपेश श्रीवास्तव(Dr.Rupesh Shrivastava) said...
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Kanishka Kashyap said...

Shama jee , achhi abhivyakti hai..
ap bahut hin sahaj tarike se gahrai me utar jatin hai,, main to bhai kayal ho gaya apki lekhni ka..
agar koi apki pasandida rachna hai to use mujhe dene ka kast karein.. apni ek laghu patrika hai, usme prakashit karne mein khusi hogi..
thanks and rehards

'sammu' said...

aabroo kaisee beaabroo kaisee ! ye sab chaltaoo mohavren hain .apnee zindgee jeene ka dam ho to duniya kee paribhashaon kee gulamee choden !

Pradeep Kumar said...

kripayaa proof ki galti durust karien kyonki ye is khoobsoorat kavita ko beaabroo kar rahi hain.

BrijmohanShrivastava said...

बहुत बे आबरू होकर तेरे कूंचे से हम निकले की तर्ज पर पहला पद
वो हमसे पूछते हैं के ग़ालिब कौन है /आप ही कहिये कि हम बतलाएं क्या /की तर्ज पर दूसरा पद
जो छत सर पर है दरो दीवार सब पर उन्ही का नाम है अपना कुछ नहीं -सही है
नए मकान की बुनियाद मैंने डाली है
उसी जमीं पे ,जो नीलम होने वाली है /
दयनीय अवस्था का अच्छा चित्रण किया है आपने
{{ सिला मिल गया में तो मेरा इतना सा निवेदन था की ""पागल करार गया ""का अर्थ यदि ये है कि हमें पागल घोषित कर गया ,या पागल बता गया तब तो कोई बात नहीं क्योंकि आम बोल चाल की भाषा में 'पागल करार कर गया ,या ऐसा करार किया आदि कहा जाता है तो मैंने सोचा करार कर गया होना चाहिए /असल में मामूली ही उर्दू जनता हूँ ,बस काम चलाऊ}}

Pradeep Kumar said...

बहुत बेआबरू हुए ,
निकाला उसने दिल से,
घर भी वही रहा ,
दर भी वही रहा ,

पूछते हैं पता हमसे ,
रहती हो किस शहर में ,

mujhe to yahee sahee lagtaa hai .

aur haan , aapki ek hi tippanee main bahut dam hai. dhanyavaad !!

BrijmohanShrivastava said...

टिप्पणी पढी ,और बातें बाद में पहली बात ये कि "म " कभी कोमल नहीं होता ,रे ,ग ,ध ,नि कोमल होते हैं म तीब्र होता है

BrijmohanShrivastava said...

[[एक गलतफ़हमी हो गई /असल में मै ंने चार पॉँच लेखकों के नाम ,चार छ : उपन्यासों के नाम ,आठ दस शेर थोड़े चुटकुले टिप्पणी देने कुछ साहित्यिक शब्द ,दो चार रागों के नाम याद कर रखे हैं और यत्र तत्र अपना पांडित्य प्रदर्शन किया क़रता हूँ ,और लोग समझते हैं कि बडा जानकार है ,उसी विद्वता प्रदर्शन के चक्कर में मैंने कुछ राग वाबत लिख दिया ./मैंने सोचा ये कि जो इतना अच्छा रचनाकार है ,तकरीवन १६ श्रेष्ठ कवितायेँ तो अकेले अप्रैल में ही लिखी गई है ,फिर कहानिया ,बागवानी ,संस्मरण ,ललित लेख और शेर भी ऐसे बजन दार की क्या अर्ज करूँ ""अब सहर होने को है ,ये शमअ बुझने को है ;जो रात में जलते है ,वे सुबह कब देखते है "" मैंने सोचा ये कि ऐसे साहित्यकार को सरगम का मामूली ज्ञान होगा तो मैंने अपने विद्वता का प्रदर्शन करना चाह और राग संबन्धी अपना पांडित्य प्रर्दशित कर दिया /हकीकत ये है कि संगीत से मेरा रिश्ता उतना ही है जैसे ""सिर्फ इतना ही रिश्ता समंदर से है दूर तक किनारे किनारे गए "}},

Pawan Kumar said...

सुन्दर अभिव्यक्ति है।

प्रसन्न वदन चतुर्वेदी said...

"पूछते हैं पता हमसे,
रहती हो किस शेहेरमे,
घर है तुम्हारा,
किस कूचे, किस गलीमे,
क्या बताएँ उनसे,
के ये ठिकाने नही हमारे?
रहे हैं बेआबरू होके..."
बहुत ही सुन्दर भावपूर्ण रचना