Wednesday, December 16, 2009

पीछेसे वार मंज़ूर नही...

अँधेरों इसके पास आना नही,
बुझनेपे होगी,"शमा"बुझी नही,
बुलंद एकबार ज़रूर होगी,
मत आना चपेट में इसकी,
के ये अभी बुझी नही!

दिखे है, जो टिमटिमाती,
कब ज्वाला बनेगी,करेगी,
बेचिराख,इसे ख़ुद ख़बर नही!
उठेगी धधक , बुझते हुएभी,
इसे पीछेसे वार मंज़ूर नही!

कोई इसका फानूस नही,
तेज़ हैं हवाएँ, उठी आँधी,
बताओ,है शमा कोई ऐसी,
जो आँधीयों से लड़ी नही?
ऐसी,जो आजतक बुझी नही?

सैंकडों जली,सैंकडों,बुझी!
हुई बदनाम ,गुमनाम कभी,
है शामिल क़ाफ़िले रौशनी ,
जिन्हें,सदियों सजाती रही!
एक बुझी,तो सौ जली॥!

11 comments:

वन्दना अवस्थी दुबे said...

हूं.....अब आया कुछ मज़ा.

मनोज कुमार said...

बहुत अच्छा लगा।
हो मुकम्मल तीरगी ऐसा कभी देखा न था
एक शम्अ बुझ गई तो दूसरी जलने लगी

योगेश स्वप्न said...

achchi rachna.

अमिताभ श्रीवास्तव said...

सैंकडों जली,सैंकडों,बुझी!
हुई बदनाम ,गुमनाम कभी,
है शामिल क़ाफ़िले रौशनी ,
जिन्हें,सदियों सजाती रही!
एक बुझी,तो सौ जली॥!
bahut khoob, aji me to isake pahle bhi aapke blogs par aayaa hu..bikhare sitare par kahaniya padhhi he to ynhaa bhi..aa chuka hu.., vese achha kiyaa aapne mujhe bataa diyaa../
bahut achha to aap likhati hi he..aour khaaskar naari man ke antardvando ko kaafi behatri se uthaati he...

दिगम्बर नासवा said...

कोई इसका फानूस नही,
तेज़ हैं हवाएँ, उठी आँधी,
बताओ,है शमा कोई ऐसी,
जो आँधीयों से लड़ी नही ....

शमा का तो काम ही जलना है ...... खुद जल कर जीवित रखती है प्रकाश को ......... जिसने देना सीखा हो उसे आँधियों से क्या डर ..........

शाहिद मिर्ज़ा ''शाहिद'' said...

कोई इसका फानूस नही,
तेज़ हैं हवाएँ, उठी आँधी,
बताओ,है शमा कोई ऐसी,
जो आँधीयों से लड़ी नही ....

आंधियों के मुकाबिल
'शमा' के हौसले को सलाम
शाहिद मिर्ज़ा शाहिद

संजय भास्कर said...

बढ़िया प्रस्तुति पर हार्दिक बधाई.
ढेर सारी शुभकामनायें.

संजय कुमार
हरियाणा
http://sanjaybhaskar.blogspot.com

ज्योति सिंह said...

कोई इसका फानूस नही,
तेज़ हैं हवाएँ, उठी आँधी,
बताओ,है शमा कोई ऐसी,
जो आँधीयों से लड़ी नही?
ऐसी,जो आजतक बुझी नही
bahut hi khoobsurat ,aapke saare blog bahut pyare hai ,diye aur gilhari wali post maine apni beti ko dikhai bahut achchha laga use ,shama ji aap laazwaab hai

"Uday" said...

सैंकडों जली,सैंकडों,बुझी!
हुई बदनाम ,गुमनाम कभी,
है शामिल क़ाफ़िले रौशनी ,
जिन्हें,सदियों सजाती रही!
एक बुझी,तो सौ जली॥!

Rashmi ji


Bahoot HI sunder RAchana hai


Subhkamnayen swikar karen

Dr.R.Ramkumar said...

दिखे है, जो टिमटिमाती,
कब ज्वाला बनेगी,करेगी,
बेचिराख,इसे ख़ुद ख़बर नही!
उठेगी धधक , बुझते हुएभी,
इसे पीछेसे वार मंज़ूर नही!

asardar bat hai..

tarannumkanpuri ne kaha hai
Aa aur sare mahfil nazarein to mila mujhse,
Muzrim hai vahi jiski jhuk jaye nazar pahle.

रचना दीक्षित said...

सैंकडों जली,सैंकडों,बुझी!
हुई बदनाम ,गुमनाम कभी,
है शामिल क़ाफ़िले रौशनी ,
जिन्हें,सदियों सजाती रही!
एक बुझी,तो सौ जली॥!

अद्भुत अद्वितीय अनूठी सटीक रचना