Wednesday, December 16, 2009

खामोशियाँ!

इन खामोशियों में मेरी
आवाज़ का वजूद खोया,
कहाँसे लाऊँ ऐसी खुशियाँ,
ग़म की परतों में दबी पडीं,
हरेक खुशीने अपना
वजूद इस तरह खोया,
लमहात पीछे छोड़,
वक़्त आगे निकाल गया!

7 comments:

मनोज कुमार said...

रचना अच्छी लगी ।

Dr.R.Ramkumar said...

हरेक खुशीने अपना
वजूद इस तरह खोया,
लमहात पीछे छोड़,
वक़्त आगे निकाल गया!

Oh! dard has nails very sharp.
Nice depiction.

AlbelaKhatri.com said...

dard ye aapka hi nahin

hamaara bhi hai

lekin bayaan aapnjhe kiya

__apka housla mubaraq !

शाहिद मिर्ज़ा ''शाहिद'' said...

शमा साहिबा,
रचना तो ठीक है
लेकिन, माफ कीजिये
जो आपका मैयार रहा है,
उससे कुछ कमज़ोर लगी
प्लीज, इसे सकारात्मक लीजियेगा

वन्दना अवस्थी दुबे said...

हां दी, शाहिद जी ठीक कह रहे हैं. ये नकारात्मक रवैया छोडना होगा आपको.

shama said...

Haan,sach hai,kabhi,kabhi kavy rachnaon me nakratmak ravvaiyya aa jata hai!

संजय भास्कर said...

बहुत ही सुन्‍दर प्रस्‍तुति ।