Saturday, December 5, 2009

शकीली बुनियादें

कभी शक बेबुनियाद निकले
कभी देखी शकीली बुनियादे
ऐसी ज़मीं कहॉ ,
जो खिसकी नही पैरोतले !
कभी खिसकी दसवें कदम पे
तो कभी कदम उठाने से पहले ....

8 comments:

वाणी गीत said...

बेबुनियाद शक पैरों तले जमीन तो खिसकाएगा ही ...कदम उठाने से पहले भी ..बाद भी ...!!

योगेश स्वप्न said...

umda.

दिगम्बर नासवा said...

शक का कोई इलाज़ नही ........ पैरों तले ज़मीन निकाल देता है .... खूबसूरत लफ्ज़ .......

वन्दना said...

chand panktiyon mein hi bahut gahri baat kah di.......bahut sundar.

Dr.R.Ramkumar said...

कभी शक बेबुनियाद निकले
कभी देखी शकीली बुनियादे
ऐसी ज़मीं कहॉ ,
जो खिसकी नही पैरोतले !
कभी खिसकी दसवें कदम पे
तो कभी कदम उठाने से पहले ....

कविता बहुत अच्छी है। यह फार्म जिस में आपने भावों का पिरोया हे वह मैंने पहली बार देखा है। वाह..

योगेन्द्र मौदगिल said...

wahwa...

डॉ टी एस दराल said...

बहुत खूब।
सुंदर पंक्तियाँ।

संजय भास्कर said...

LAJWAAB RACHNA
संजय कुमार
हरियाणा
http://sanjaybhaskar.blogspot.com