Sunday, November 29, 2009

आहट

दूर से इक आहट आती रही,
ज़िंदगी का सामाँ बनाती रही,
चुनर हवा में उडती रही,
किसीने आना था नही,
हवा फिर भी गुनगुनाती रही..
दूर से इक आहट आती रही..

4 comments:

ktheLeo said...

वाह! सुन्दर!
बिल्कुल जैसे कि,

"कौन आया है यहां कोई न आया होगा,
मिरा दरवाज़ा हवाओं ने हिलाया होगा."
-बशीर बद्र

मनोज कुमार said...

इस रचना ने मन मोह लिया।

दिगम्बर नासवा said...

आहट सी कोई आए तो लगता है की तुम हो .....
बहुत पहले सुनी इस ग़ज़ल की याद करा दी आपने .... बहुत उम्दा नज़्म लिखी है आपने ......

R. Venukumar said...

किसीने आना था नही,
हवा फिर भी गुनगुनाती रही..
दूर से इक आहट आती रही..

और एक शायर ने पूछा है...
ये कौन आ गई दिलरुबा महकी महकी ?
ळवा महकी महकी , फ़ज़ा महकी महकी ?