Thursday, November 26, 2009

वजूद..

इन खामोशियों में मेरी,
आवाज़ का वजूद खोया,
कहाँ से लाऊँ खुशियाँ,
गम की परतों में दबी
हरेक खुशीने अपना
वजूद इसतरह खोया,
लमहात पीछे छोड़,
वक़्त आगे निकल गया....

9 comments:

मनोज कुमार said...

संवेदनशील रचना। बधाई।

रश्मि प्रभा... said...

waqt kitna bhi aage kyun n chala jaye........deewaron pe apni yaaden saath hoti nhain

निर्झर'नीर said...

sanvedna to har shabd mein basi hai aapke..bahut din baad aapko padhne ka mauka mila .

योगेश स्वप्न said...

badhia rachna.

योगेश स्वप्न said...

sunder abhivyakti.

वन्दना अवस्थी दुबे said...

सच है खामोशी आवाज़ को निगल ही तो लेती है..बहुत भावुक करने वाली कविता है दी.

mark rai said...

very nice........

अभिषेक प्रसाद 'अवि' said...

kam shabdon mein itni achhi kavita... aapki khamoshi achhi lagi. meri khamoshi par aaiyega...

Dr.R.Ramkumar said...

इन खामोशियों में मेरी,
आवाज़ का वजूद खोया,

लमहात पीछे छोड़,
वक़्त आगे निकल गया....

वक्त के दर्द का एक सुच्चा अहसास... उदासियों के झांकते अक्श...बेहतर..