Monday, July 13, 2009

खिलने वाली थी...

खिलनेवाली थी, नाज़ुक सी
डालीपे नन्हीसी कली...!
सोंचा डालीने,ये कल होगी
अधखिली,परसों फूल बनेगी..!
जब इसपे शबनम गिरेगी,
किरण मे सुनहरी सुबह की
ये कितनी प्यारी लगेगी!
नज़र लगी चमन के माली की,
सुबह से पहले चुन ली गयी..
खोके कोमल कलीको अपनी
सूख गयी वो हरी डाली....

11 comments:

mark rai said...

खिलनेवाली थी, नाज़ुक सी
डालीपे नन्हीसी कली
सोंचा डालीने,ये कल होगी
अधखिली,परसों फूल बनेगी.....
bahut hi sundar....kavita ji padh kar maja aa gaya....

'अदा' said...

नज़र लगी चमन के माली की,
सुबह से पहले चुन ली गयी..
खोके कोमल कलीको अपनी
सूख गयी वो हरी डाली....
jawab nahi shama ji aapka !!
bahut hi sundar likha hai..
waah waah ..

अर्चना तिवारी said...

सच में बड़ी दुखद बात कही आपने...लोग फूल क्यों तोड़ते हैं..उनका भी जीवन है ...

Shama said...

अर्चनाजी ,
एक जवाब तो यहीँ दे रही हूँ ...ये 'फूल ' या' कली',प्रतीकात्मक है ..इसका मानवी जीवन से सम्बन्ध है ..एक लडकी का जन्म ..जो होने नही दिया ...माँ की कोख में ही उसे मार डाला गया...किसी 'womens' day" पे रचना लिखी थी...ये औरत का अपमान है..मातृत्व का अपमान..माली अन्य कोई नही...पुरूष सत्तात्मक समाज है...स्वयं पिता है...मैंने ऐसे पिता देखे हैं, जिन्हों ने अपनी पत्नी के गर्भावस्था में ही 'स्त्री' भ्रूण को गिरा दिया...

Aapkee phoolon kee pratee samvednaa bhee samajh saktee hun...!
Poojake liye kitne berahmee se phool tod liye jaate hain..! Jabki, gar unhen sahee tareeqe se kaat ke paanee me daal phool daan me sajaya jaay,to unkee umr badhatee hai..!

अर्चना तिवारी said...

ohh bahut gahra bhaav hai...

‘नज़र’ said...

यह रचना भी बहुत अच्छी है
---आपका स्वागत है
श्री युक्तेश्वर गिरि के चार युग

ktheLeo said...

Thought provoking poem.

डॉ. मनोज मिश्र said...

behad khoobsoorat rchna.

वन्दना अवस्थी दुबे said...

प्रतीकात्मक शैली मे कही गई बहुत मार्मिक बात!!चाहे वह भ्रूण-हत्या हो या फ़िर मासूमों के साथ बलात्कार का मामला, दोनोंही स्थितियों में कली ही मुरझाती है.

नीरज कुमार said...

नज़र लगी चमन के माली की,
सुबह से पहले चुन ली गयी..


Marmik rachna...

M VERMA said...

मार्मिक व प्रभावशाली
कटु यथार्थ