Saturday, July 11, 2009

जाने क्या?

तमाम शहर रौशन हो, ये नही होगा,
शमा जले अन्धेरे में ये उसकी मज़बूरी है.

दर्द मज़लूम का न गर परेशान करे,
ज़िन्दगी इंसान की अधूरी है.

ज़रूरी काम छोड के इबादत की?
समझ लो खुदा से अभी दूरी है.

सच कडवा लगे तो मैं क्या करूं,
इसको कहना बडा ज़रूरी है.

11 comments:

M VERMA said...

सच कडवा लगे तो मैं क्या करूं,
इसको कहना बडा ज़रूरी है.
============
सच जब कडवा लगने लगे तो समझो असर हो रहा है.

raj said...

sach kadwa lage to kya karu?....har shabad har pankti dil chhoo leti hai....

वन्दना अवस्थी दुबे said...

क्या बात है.हमेशा की तरह...

Shama said...

"...खुदासे अभी दूरी है...!"बेहद सच कहा...! हम अपने कर्तव्य, जो साफ़ नज़र आते हैं, किसी 'ritual' को जब अधिक महत्त्व देने लगते हैं, तो ये दूरी बना लेते हैं...
लेकिन रचनाका हर शब्द, हर पंक्ती,अपने आपमें मुकम्मल है...!

ktheLeo said...

इन तमाम तारीफ़ करने वाले सुधी पाठकों से नम्र निवेदन है कि "सच में" पर अपनी गरिमामयी उपस्थिति अवश्य दर्ज़ करायें.हौसला अफ़जाई तो होती ही है,अच्छा लगता है.If you all(including 'Shamaa Ji)' follow my Blogg (www.sachmein.blogspot.com) I will feel honored.
रचना को सराहने के लिये आप सब का तहे दिल से शुक्रिया!

Pradeep Kumar said...

ज़रूरी काम छोड के इबादत की?
समझ लो खुदा से अभी दूरी है.


सच कडवा लगे तो मैं क्या करूं,
इसको कहना बडा ज़रूरी है.

bahut khoob !!!
ek muddat ke baad blog ki dunia main aayaa hoon to ise padhkar pataa chalaa ki kaam main busy rahakar in dinon main kis cheej se mehroom tha .

नीरज कुमार said...

शमा मैम,
अच्छी रचना है, सुन्दर भावाभ्यक्ति है...
आजकल आप मेरे ब्लॉग पर नहीं आती ..नाराज़ हैं या व्यस्त हैं कार्यों में...

Shama said...

Ye rachna leo ji kee hai..unke saath apna 'kavita' blog sanjha kar rahee hun...unkee shukrguzaar hun,ki, itnee sundar rachnayen pesh kar,is blog me chaar chaand laga dete hain..!

ktheLeo said...

You are welcome, Madam as always!

'अदा' said...

तमाम शहर रौशन हो, ये नही होगा,
शमा जले अन्धेरे में ये उसकी मज़बूरी है.
bahut khoob...

सच कडवा लगे तो मैं क्या करूं,
इसको कहना बडा ज़रूरी है.

aji aap be-dhadak kahen..
ham hain na, sun rahen hain..
jabardast likha hai aapne..

‘नज़र’ said...

बहुत ही उम्दा
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श्री युक्तेश्वर गिरि के चार युग