Saturday, April 25, 2009

सच्चाई जान लेने दो....

गर्दूं-गाफिल ने कहा…

चाहना हक नहीं उल्फत ,मुहब्बत तो है मिट जाना
बाँटना मुस्कुराहट ही ,फकत चाहत का पैमाना

जमाने के लिए रोता , जमाने लिए हंसता
मजहब जिसका मुहब्बत है जमाने के लिए मरता
उम्मीदें जिसने पालीं हैं ,वही गमगीन होता है
जिसे तुम आजमाओगे, वही टूटेगा पैमाना

खोल लो दिल के दरवाजे ,हवाओं को गुजरने दो
अंदेशे तो सदा होंगे ,उन्हें भी वार करने दो
सच्चाई जान लेने दो , गुरुर ऐ बद गुमानी को,
वो चाहत ख्वाब है याफ़िर दिलेवहशत का अफसाना

गर्दूं -गाफिल जिकी ये रचना ख़ुद उन्होंने पेश की थी, मेरे कविता ब्लॉग पे( टिप्पणीके साथ) ...मुझे ये रचना अप्रतीम लगी...और अपने ब्लॉग पे डाल दी...उनके ब्लॉग पेभी है..मुझे लगा कि , गर पाठक यहाँ भी पढ़ें,तो और ज़्यादा पढी जायेगी...टिप्पणी तो खो जायेगी...

3 comments:

'sammu' said...

achcha chunav hai aapka shamajee !

SWAPN said...

achchi rachna hai gafil ji ki.

mark rai said...

खोल लो दिल के दरवाजे ,हवाओं को गुजरने दो
अंदेशे तो सदा होंगे ,उन्हें भी वार करने दो................
yah unka fundamental right hai , ham nahi chhin sakte.