Monday, November 14, 2011

शायद इसी लिये!




तेरे थरथराते कांपते होठों पर,
मैंने कई बार चाहा कि,
अपनी नम आंखे,
रख दूं!


पर,





  


तभी बेसाख्ता  याद आया
भडकती आग पर,
घी नही डाला करते!




मुझे यकीं है के,
तेरे भी ज़ेहन में,
अक्सर आता है,
ये ख्याल के 


तू भी,


कभी तो!


मेरे ज़ख्मों पे दो बूंद 
अपने आंसुओं की गिरा दे,


पर मैं जानता हूं
के तू भी डरता है,
भडकती आग में 
घी डालने से!






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7 comments:

shama said...

Anoothee,aprateem rachana!

ana said...

khubsurat sa ahasas....pyar ka...badhiya

ktheLeo said...

शुक्रिया!

दिगम्बर नासवा said...

बहुत खूब .. काश के ये घी कभी पानी बन सकता और ठंडक पहुंचा पाता ... लाजवाब लिखा है ...

mridula pradhan said...

achcha likhe......

avanti singh said...

bahut khub likha aap ne...

NISHA MAHARANA said...

पर मैं जानता हूं
के तू भी डरता है,
भडकती आग में
घी डालने से!good expression.