Friday, November 4, 2011

काश...!


कितने' काश' लिए बैठे थे दिल में,
खामोश ज़ुबाँ, बिसूरते हुए मुँह में,
कब ,क्यो,किधर,कहाँ, कैसे,
इन सवालात घेरे में,
अपनी तो ज़िंदगानी घिरी,
अब, इधर, यहाँ यूँ,ऐसे,
जवाब तो अर्थी के बाद मिले,
क्या गज़ब एक कहानी बनी,
लिखी तो किसी की रोज़ी बनी,
ता-उम्र हम ने तो फ़ाक़े किए,
कफ़न ओढ़ा तो चांदी बनी...

6 comments:

ana said...

kay bat hai....ati uttam rachana

M VERMA said...

जवाब के तलाश मे जिन्दगी गुजर जाती है

सागर said...

bhaut hi behtreen...

शाहिद मिर्ज़ा ''शाहिद'' said...

बहुत खूबसूरत नज़्म है...वाह

दिगम्बर नासवा said...

जीवन के जवाब ही नहीं मिलते ... सवाल तो बहुत मिल जाते हैं ...

Human said...

bahut khoob !