Monday, March 22, 2010

तलाश खुद अपनी!

खास "कविता" के पाठकों से नज़रे इनायत की उम्मीद में :

इन्तेहा-ए-उम्मीदे-वफ़ा क्या खूब!
जागी आंखों ने सपने सजा लिये।

मौत की बेरुखी, सज़र-ए-इन्सानियत में,
अधमरे लोग हैं,गिद्दों ने पर फ़ैला लिये।

चाहा था दुश्मन को दें पैगाम-ए-अमन
दोस्तों ने ही अपने खंजर पैना लिये।

भीड में कैसे मिलूंगा, तुमको मैं?
ढूंडते हो खुद को ही,तुम आईना लिये!

7 comments:

रश्मि प्रभा... said...

bahut hi badhiyaa likha hai

दिगम्बर नासवा said...

भीड में कैसे मिलूंगा, तुमको मैं?
ढूंडते हो खुद को ही,तुम आईना लिये ..

बहुत खूब .. क्‍माल की बात कह दी इन शेरो में .....

sangeeta swarup said...

खूबसूरत ख़याल...अच्छी ग़ज़ल

योगेश स्वप्न said...

wah. bahut khoob.

shama said...

चाहा था दुश्मन को दें पैगाम-ए-अमन
दोस्तों ने ही अपने खंजर पैना लिये।
Kya baat hai Leoji! Waise harek sher apneaap me mukammal hai!

शाहिद मिर्ज़ा ''शाहिद'' said...

चाहा था दुश्मन को दें पैगाम-ए-अमन
दोस्तों ने ही अपने खंजर पैना लिये।
वाह...शानदार
इसी सिलसिले में मेरा एक शेर देखें-
ख़जर था किसके हाथ में ये तो ख़बर नहीं,
हां! दोस्त की तरफ़ से मैं गाफ़िल ज़रूर था.

ktheLeo said...

Vaah Sahid Sahib Vaah!