Saturday, September 12, 2009

एक आहट..

दूर कहीँ आहट हुई,
लगा ,गुज़रा कोई,
दिलकी राहों पे दस्तक हुई,
लगा गुज़रा कोई,

दिलने धीरेसे द्वार खोला,
ना राही न परिंदा!
कोई कहीँ नही था!
ये कौन गुज़रा था?

मुझे ये क्या हुआ?
ये महसूस हुआ?
इस सवाल का
जवाब कोई होगा?

8 comments:

Amit K Sagar said...

अहिस्ता-अहिस्ता चलते हुए रचना एक दम से प्रश्न हो जाती है? यही यथार्थ इसकी खूबी है! बहुत खूब!
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Till 25-09-09 लेखक / लेखिका के रूप में ज्वाइन [उल्टा तीर] - होने वाली एक क्रान्ति!

वन्दना said...

adbhut prastuti.............aisi aahtein aur aisi dastak.........aur use mehsoos karna ...........waah waah.

pls visit my new blog also:
http://ekprayas-vandana.blogspot.com

ओम आर्य said...

bahut hi sundar rachana......

वन्दना अवस्थी दुबे said...

हां होता है ऐसा भी कभी-कभी..किसी के होने का अहसास...सुन्दर कविता.

मुकेश कुमार तिवारी said...

शमा जी,

उस सवाल का जवाब जरूर मिलेगा किसी दिन यह सोच कर ही किसी भी आहट या दस्तक को कोई दरकिनार नही करता।

एक अच्छी कविता।

सादर,


मुकेश कुमार तिवारी

आमीन said...

आपकी लेखनी में प्रशन हैं... बहुत कम शब्दों में बड़ी बात कहने की खूबी है आपने... अच्छा लिखा है

अविनाश वाचस्पति said...

आहट ही हटना है
जवाब इसका घटना है

'sammu' said...

कुछ हुवा महसूस क्यों ?
इन सवालों का जबाब ?
दे सके इन्सान तो
इंसा नहीं रह जायेगा .

दिल के दरवाजे खुले,
कब कब कहाँ, कैसे खुले
कौन आया कौन गुजरा
कौन ठहरा क्या पता ?

इस लिए ही दिल भी दिल है
किस की आहट क्या पता ?
कौन ठहरा क्या पता ?
इस लिए ही दिल भी दिल है
किस की आहट क्या पता ?