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Friday, April 16, 2010

स्याह अंधेरे..


कृष्ण पक्षके के स्याह अंधेरे
बने रहनुमा हमारे,
कई राज़ डरावने,
आ गए सामने, बन नज़ारे,
बंद चश्म खोल गए,
सचके साक्षात्कार हो गए,
हम उनके शुक्रगुजार बन गए...

बेहतर हैं यही साये,
जिसमे हम हो अकेले,
ना रहें ग़लत मुगालते,
मेहेरबानी, ये करम
बड़ी शिद्दतसे वही कर गए,
चाहे अनजानेमे किए,
हम आगाह तो हो गए....

जो नही थे माँगे हमने,
दिए खुदही उन्होंने वादे,
वादा फरोशी हुई उन्हीसे,
बर्बादीके जश्न खूब मने,
ज़ोर शोरसे हमारे आंगनमे...
इल्ज़ाम सहे हमीने...
ऐसेही नसीब थे हमारे....

Thursday, July 16, 2009

सिला मिल गया....

बेपनाह मुहोब्बतका सिला मिल गया,
जिन पनाहोंमे दिल था,
वही बेदिल,बे पनाह कर गया...
मेरीही जागीरसे, बेदखल कर गया...!
मिल गया, मुझे सिला मिल गया....

दुआओं समेत, सब कुछ ले गया,
हमें पागल करार कर गया,
दुनियादार था, रस्म निभा गया,
ज़िंदगी देनेवाला ख़ुद मार गया,
मिल गया, मुझे सिला मिल गया...

तुम हो सबसे जुदा, कहनेवाला,
हमें सबसे जुदा कर गया,
मै खतावार हूँ तुम्हारा,
कहनेवाला, खुदको बरी कर गया,
मिल गया मुझे सिला मिल गया...

ता क़यामत इंतज़ार करूँगा,
कहके, चंद पलमे चला गया,
ना मिली हमारी बाहें,तो क्या,
वो औरोंकी बाहोंमे चला गया..
मिल गया ,मुझे सिला मिल गया...

मौत मारती तो बेहतर होता,
हमें मरघट तो मिला होता,
उजडे ख्वाब मेरे, उजड़ी बस्तियाँ,
वो नयी दुनियाँ बसाने चल दिया...
मिल गया, मुझे सिला मिल गया....

कैद्से छुडाने वो आया था,
मेरे परतक काटके निकल गया,
औरभी दीवारें ऊँची कर गया...
वो मेरा प्यार था, या सपना था,
दे गया, मुझे सिला दे गया...

मुश्किलोंमे साथ देनेका वादा ,
सिर्फ़ वादाही रह गया,
आसाँ राहोंकी तलाशमे निकल गया...
ज़िंदगी और पेचीदा कर गया...
दे गया, मुझे सिला दे गया...

Friday, May 8, 2009

कहते हैं कि...

कहते हैं कि, वो हमें,
ताउम्र प्यार करेंगे,
हमभी जिद्पे उतर आएँ हैं,
देखेते हैं कैसे याद रखेंगे ?
कहते हैं तो कहते रहें...

उम्र की क्या बात करें हैं,
पलोंकी खैर मनाएँ,
हम ऐसी चीज़ हैं,
पताभी न होगा उन्हें,
वोभी यही कहेँगे...!

पलमे सिवा हिकारत के,
वो दिलमे अपने
कुछभी ना पायेंगे!
क्यों किसीको याद आएँ?
हमभी ज़िदपे अमादा हैं...

क्यों बेवजह उन्हें सताएँ?
जब की तमन्नाएँ बहारें,
उनके वास्ते, क्यों खिजाएँ,
बनके उनके सामने आएँ?
चाहेंगे,वो ललकारें बहारें...

हम बन पत्ते पतझड़ के,
उड़ जायेंगे संग हवाके,
या बिछ जायेंगे, उन्हींके,
पैरोंतले, मसलके जिसे
वो मीलों निकल जायेंगे...

वादा रहा हमारा हमीसे,
वो इसतरह भूलेंगे,
हमें, कि जैसे,फूलोंसे,
उडी हो गंध,सूखे हुए...
वो राहोंसे गुज़र जायेंगे!

लिए थे इम्तेहाँ ज़हेरके,
ज़िन्दगीमे गलतीसे,
आज जानबूझके,
वही गलती दोहरा लेंगे,
वो समझभी ना पायेंगे!

Monday, April 27, 2009

सिला मिल गया....

बेपनाह मुहोब्बतका सिला मिल गया,
जिन पनाहोंमे दिल था,
वही बेदिल,बे पनाह कर गया...
मेरीही जागीरसे, बेदखल कर गया...!
मिल गया, मुझे सिला मिल गया....

दुआओं समेत, सब कुछ ले गया,
हमें पागल करार गया,
दुनियादार था, रस्म निभा गया,
ज़िंदगी देनेवाला ख़ुद मार गया,
मिल गया, मुझे सिला मिल गया...

तुम हो सबसे जुदा, कहनेवाला,
हमें सबसे जुदा कर गया,
मै खतावार हूँ तुम्हारा,
कहनेवाला, खुदको बरी कर गया,
मिल गया मुझे सिला मिल गया...

ता क़यामत इंतज़ार करूँगा,
कहके, चंद पलमे चला गया,
ना मिली हमारी बाहें,तो क्या,
वो औरोंकी बाहोंमे चला गया..
मिल गया ,मुझे सिला मिल गया...

मौत मारती तो बेहतर होता,
हमें मरघट तो मिला होता,
उजडे ख्वाब मेरे, उजड़ी बस्तियाँ,
वो नयी दुनियाँ बसाने चल दिया...
मिल गया, मुझे सिला मिल गया....

कैद्से छुडाने वो आया था,
मेरे परतक काटके निकल गया,
औरभी दीवारें ऊँची कर गया...
वो मेरा प्यार था, या सपना था,
दे गया, मुझे सिला दे गया...

मुश्किलोंमे साथ देनेका वादा ,
सिर्फ़ वादाही रह गया,
आसाँ राहोंकी तलाशमे निकल गया...
ज़िंदगी और पेचीदा कर गया...
दे गया, मुझे सिला दे गया...