था आफताब भी ,था माहताब भी!
तब अँधेरे घनेरे थे,ऐसा नही,
थे रौशनी के हज़ार क़ाफ़िले भी!
सर पर के बोझ का दोष नही,
पगतले तिमिर का आक्रोश नही,
खुली सराय बुला रही थी!
चमन में हलचली थी मची,
संभलो लुटेरा है,यहीँ कहीँ!
न सुननेकी मैंने जो ठानी थी!
मै तो उजालों में ठगी जानी थी!
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9 comments:
अहसास और तकलीफ़ का अच्छा चित्रण है!
बहुत सुंदर जज़्बात. सुंदर सन्देश देती बढ़िया प्रस्तुती.
मै तो उजालों में ठगी जानी थी...
ऐसे भाव पर हम मर-मिटें... क्या खूब लिखा है...
आपकी रचनात्मक ,खूबसूरत और भावमयी
प्रस्तुति भी कल के चर्चा मंच का आकर्षण बनी है
कल (24-2-2011) के चर्चा मंच पर अपनी पोस्ट
देखियेगा और अपने विचारों से चर्चामंच पर आकर
अवगत कराइयेगा और हमारा हौसला बढाइयेगा।
http://charchamanch.blogspot.com/
तब अँधेरे घनेरे थे,ऐसा नही,
थे रौशनी के हज़ार क़ाफ़िले भी!
क्या बात है, वाह इन दो पंक्तियों में ही जैसे सब कुछ कह दिया गया...बधाई.
गहन भावों का सूक्ष्म चित्रण
बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति ...
bhavpoorna aut satik chitran
ना सुनने की मैंने ठानी थी , मैं तो उजालों में ठगी जानी थी !
सुन्दर !
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