Friday, August 20, 2010

"कविता" पर ,खुद की मज़ार!

मैं तेरे दर से  ऐसे गुज़रा हूं,
मेरी खुद की, मज़ार हो जैसे!

वो मेरे ख्वाब में यूं आता है,
मुझसे ,बेइन्तिहा प्यार हो जैसे!

अपनी हिचकी से ये गुमान हुआ,
दिल तेरा बेकरार हो जैसे!

परिंद आये तो दिल बहल गया,
खिज़ां में भी, बहार हो जैसे!

दुश्मनो ने यूं तेरा नाम लिया,
तू भी उनमें, शुमार हो जैसे! 

कातिल है,लहू है खंज़र पे,
मुसकुराता है,कि यार हो जैसे!




आपका स्वागत है!यहां भी!
"सच में" www.sachmein.blogspot.com

7 comments:

वन्दना said...

मैं तेरे दर से ऐसे गुज़रा हूं,
मेरी खुद की, मज़ार हो जैसे!

वो मेरे ख्वाब में यूं आता है,
मुझसे ,बेइन्तिहा प्यार हो जैसे!

अपनी हिचकी से ये गुमान हुआ,
दिल तेरा बेकरार हो जैसे!

परिंद आये तो दिल बहल गया,
खिज़ां में भी, बहार हो जैसे!

ओह्……………क्या जज़्बात उभर कर आये हैं………आह!हर शेर दिल मे उतर गया।

shama said...

Oh!Wah! Bas itnahi kah sakti hun!

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

बहुत खूबसूरत गज़ल...

वाणी गीत said...

हर एक शेर अपने आप में ख़ास है ..!

शाहिद मिर्ज़ा ''शाहिद'' said...

अश’आर के भाव बहुत अच्छे लगे.

दिगम्बर नासवा said...

अपनी हिचकी से ये गुमान हुआ,
दिल तेरा बेकरार हो जैसे!

वाह .. प्रेम की क्या इंतेहा है ...
हर शेर लाजवाब है सर .....

भूतनाथ said...

vaah bahut acchha laga yahaan aakar bhi...