Saturday, July 3, 2010

नसीब !"कविता" पर भी!


ज़िन्दगी अच्छी है,
पर अज़ीब है न?

जो बुरा है,
कितना लज़ीज़ है न?

गुनाह कर के भी वो सुकून से है,
अपना अपना ज़मीर, है न?

मैं तुझीसे मोहब्बत करता हूं
आखिर मेरा भी रकीब है न?

कैसे उठाऊं मै नाज़ तेरा,
कांधे पर सलीब है न?

उसका दुश्मन कोई नहीं है यहां
वो सच मे कितना बदनसीब है न?

सोना चांदी बटोरता रहता है,
बेचारा कितना गरीब है न?

दर्द पास आयेगा कैसे,
तू तो मेरे करीब है न?


9 comments:

अजय कुमार said...

अच्छी गजल ,पसंद आई ।

Amitraghat said...

"बेहतरीन...अंत तो कमाल का था..."

shama said...

Wah! Harek sher gazab hai...harek lafz apni jagah gadha hua hai!

सन्ध्या आर्य said...

amazing ............

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

खूबसूरत रचना

राजेश उत्‍साही said...

पढ़कर अच्‍छा लगा। शुभकामनाएं।

Virendra Singh Chauhan said...

Mast ..Rachna. I like it very Much.
Thanks.

ana said...

sundar rachana.............badhai

वाणी गीत said...

गुनाह करके भी सुकून से कैसे है ...
यही हैरानी तो बार बार होती है !
sundar rachna!