Thursday, February 25, 2010

सच और सियासत! "कविता" पर!

कुछ लफ़्ज़ मेरे इतने असरदार हो गय्रे,
चेहरे तमाम लोगो के अखबार हो गये.

मक्कारी का ज़माने में  ऐसा चलन हुया,
चमचे तमाम शहर की सरकार हो गये.

यूं ’कडवे सच’ से ज़िन्दगी में रूबरू हुये,
रिश्ते तमाम तब से बस किरदार हो गये.

चंद दोस्तों ने वफ़ा की ऐसी मिसाल दी,
कि दुश्मनों के पैतरे बेकार हो गये.

5 comments:

संजय भास्कर said...

behtreen rachna..

shama said...

Leoji, harek sher ekse badhke ek hai! Wah!

योगेश स्वप्न said...

मक्कारी का ज़माने में ऐसा चलन हुया,
चमचे तमाम शहर की सरकार हो गये.
badhia rachna,

शाहिद मिर्ज़ा ''शाहिद'' said...

आदाब
कुछ लफ़्ज़ मेरे इतने असरदार हो गय्रे,
चेहरे तमाम लोगो के अखबार हो गये.
सभी शेर खूबसूरत हैं.....मतला लाजवाब रहा

दिगम्बर नासवा said...

चंद दोस्तों ने वफ़ा की ऐसी मिसाल दी,
कि दुश्मनों के पैतरे बेकार हो गये.

ग़ज़ब के शेर हैं ...
आपको और आपके समस्त परिवार को होली की शुभ-कामनाएँ ...