Monday, January 11, 2010

दर्द का पता!

कल रात मेरी जीवन साथी संजीदा हो गईं,
मेरी कविताएं पढते हुये,


उसने पूछा,


क्या सच में! 


आप दर्द को इतनी शिद्द्त से महसूस करते हैं? 
या सिर्फ़ फ़लसफ़े के लिये मुद्दे चुन लेतें हैं!  


दर्द की झलक जो आपकी बातों में है,
वो आई कहां से?


मैने भी खूबसूरती से टालते हुये कहा,


दर्द खजाने हैं,इन्हें छुपा कर रखता हूं,
कभी दिल में,कभी दिल की गहराईओं में


खजानों का पता गर सब को बताता,
तो अब तक कब का लुट गया होता!


मेरे किसी दोस्त ने कभी बहुत ही सही कहा था!


’ये फ़कीरी लाख नियामत है, संभाल वरना,
इसे भी लूट के ले जायेंगें ज़माने वाले!’          

6 comments:

वन्दना said...

kitna sahi kaha aapne...........sach dard ki daulat har kisi ko dikhayi nhi jati
ye wo nemat hai jo har kisi par lutayi nhi jati

दिगम्बर नासवा said...

सच कहा .... दर्द अकेले में ही जिया जाता है ......... जमाना तो बस उसका मज़ाक ही उड़ाता है ...........

योगेश स्वप्न said...

VANDANA JI NE SAHI KAHA HAI, DARD KE KHAZANE KO DIL MEN LOCK KARKE RAKHNA HI ACHCHA HAI.

शाहिद मिर्ज़ा ''शाहिद'' said...

दर्द कहीं निजता, तो कहीं सार्वजनिक किया जाता है
और ये फैसला हमें अपने विवेक से विश्वास के आधार पर लेना होता है
सुन्दर रचना
शाहिद मिर्ज़ा शाहिद

shama said...

Bahut khoob...!

psingh said...

सुन्दर रचना
खजानों का पता गर सब को बताता,
तो अब तक कब का लुट गया होता!
धन्यवाद