Wednesday, February 22, 2012

क़हत..


हर क़हत में हम सैलाब ले आये,
आँसूं सूख गए, क़हत बरक़रार रहे..

कहनेको तो धरती निर्जला है,
ज़रा दिलकी सरज़मीं देखो, कैसी है?

दर्द के हजारों बीज बोये हुए हैं,
पौधे पनप रहे हैं,फसल माशाल्लाह है!

6 comments:

सदा said...

दर्द के हजारों बीज बोये हुए हैं,
पौधे पनप रहे हैं,फसल माशाल्लाह है!
बहुत बढि़या।

दिगम्बर नासवा said...

Kash is dard ki fasal pe baarish ka marham pad jaye .. Dard kuch kam ho jaye ... Dard bhari nazm ...

avanti singh said...

bdhiya rachna hai

प्रसन्न वदन चतुर्वेदी said...

वाह...
सुन्दर प्रस्तुति.....बहुत बहुत बधाई...

सतीश सक्सेना said...

दर्द के हजारों बीज बोये हुए हैं,
पौधे पनप रहे हैं,फसल माशाल्लाह है!

बहुत खूब ...बढ़िया सच्चाई बयान की है

आशा जोगळेकर said...

दर्द ही दर्द है ।