Friday, March 11, 2011

ज़हर का इम्तेहान.....

ज़हर का इम्तेहान.....

बुज़ुर्गोने कहा, ज़हरका,
इम्तेहान मत लीजे,
हम क्या करे गर,
अमृतके नामसे हमें
प्यालेमे ज़हर दीजे !
अब तो सुनतें हैं,
पानीभी बूँदभर चखिए,
गर जियें तो और पीजे !
हैरत ये है,मौत चाही,
ज़हर पीके, नही मिली,
ज़हर में मिलावट मिले
तो बतायें, क्या कीजे?
तो सुना, मरना हैही,
तो बूँदभर अमृत पीजे,
जीना चाहो , ज़हर पीजे!

5 comments:

वाणी गीत said...

जीना चाहो , जहर पीजे ...
फर्क बस पीने के नजरिये में है ...कुछ लोंग दर्द को दवा समझकर पी जाते हैं , कुछ का दर्द खुद उनको ही पी जाता है !

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

हर पल ज़हर पी कर ही तो जी रहे हैं ...सुन्दर प्रस्तुति

वन्दना said...

वाह क्या बात कही है…………अति सुन्दर्।

दिगम्बर नासवा said...

Waah .. jeene ke liye jahar peena ... lajawaab likha hai aaj ke dour ko ...

धीरेन्द्र सिंह said...

ज़िंदगी के वर्तमान परिस्थिति का खूबसूरत चित्रण।