Friday, April 23, 2010

मुर्ग मुस्सलम और पानी! "कविता" के पाठकों के लिये भी!


Select a Pot which is wide enough for the birds .
खुली जगह जैसे लान या टेरस आदि में रखें 






















मेरे एक अज़ीज़ दोस्त का SMS आया,
लिखा था,

"भीषण गर्मी है,
भटकती चिडियों के लिये,
आप रखें,

खुली जगह,और बालकनी में,
पानी!"

"ईश्वर खुश होगा,
और करेगा,
आप पर मेहरबानी!"

मैं थोडा संजीदा हुया,
और लगा सोचने,

मौला! ये तेरी कैसी कारस्तानी?
ये मेरा जिगर से प्यारा दोस्त,
मुझसे क्यूं कर रहा है,छेडखानी!

पूरे का पूरा मुर्ग खा जाता है,
वो भी सादा नहीं,सिर्फ़ ’मुर्ग मसाला-ए-अफ़गानी’

तो क्या कहूं इसे,
इंसान की नादानी?
या दस्तूर-ए-दुनिया-ए-फ़ानी! 

कैसा दिल है इंसान का?
मुर्ग को ’मसाल दानी’!
और भटकते परिंदो को "पानी"!
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PS: Immediately after the writing the thought I  kept the Pots as seen in the post. You all may like to do the same, because jokes apart we will help the poor birds by doing so:

वैसे भी :
एक ने कही, दूजे ने मानी,
गुरू का कहना दोनो ज्ञानी| 

7 comments:

संजय भास्कर said...

खुली जगह,और बालकनी में,
पानी!"

......बहुत ही सुन्‍दर प्रस्‍तुति ।

shama said...

Leoji, phir ekbaar..wah!
Maine apne terrace pe bhi isee tarah paanee rakha hai!

शाहिद मिर्ज़ा ''शाहिद'' said...

खुली जगह,और बालकनी में,पानी!"

"ईश्वर खुश होगा,और करेगा,आप पर मेहरबानी!"
मशवरा तो नेक है....

दिगम्बर नासवा said...

आपका व्यंग बहुत खूब है ... कविता सोच को दिशा देती है ...

श्याम कोरी 'उदय' said...

...sundar abhivyakti, prerak rachanaa!!!!

अरुणेश मिश्र said...

प्रशंसनीय ।

sangeeta swarup said...

बहुत सटीक रचना....जो लोग मांसाहारी हैं वो परिंदों की चिन्त्ता करें तो ऐसे विचार आना स्वाभाविक है...