Wednesday, October 14, 2009

जाने क्यों?

झड़ रहे पत्ते , मानो हो खिज़ा ,

वैसे था तो ये मौसमे बहारां

कूकती नही कोयल,जाने क्यों?

मुरझा रहे हैं गुल,जाने क्यों?..

नदी किनारे खाली है नैय्या,

नदी पार करते नही लोग,

उस किनारेसे महरूम हैं लोग,

खामोश हैं लहरें जाने क्यों?

11 comments:

वन्दना अवस्थी दुबे said...

एक और उम्दा गज़ल. कई भाव समेटे है अपने आप में.

योगेश स्वप्न said...

achcha prayas.

M VERMA said...

उस किनारेसे महरूम हैं लोग,
खामोश हैं लहरें जाने क्यों?
उस किनारे के सौन्दर्य से नावाकिफ़ होंगे लोग. जब पता लग जायेगा तो ताता लग जायेगा.
बहुत सुन्दर रचना

ओम आर्य said...

कई बार मौसम अपने पूरे सौन्दर्य के साथ नही आता ......ऐसे मे सभी जगह उदासी और गम का महौल का हो जाना वाजिब है .......एक सुन्दर अभिव्यक्ति !

रश्मि प्रभा... said...

bas yahi kahungi ki bahut badhiyaa likhti hain aap....



कुछ दीये खरीदने हैं,
कामनाओं की वर्तिका जलानी है .....
स्नेहिल पदचिन्ह बनाने हैं
लक्ष्मी और गणेश का आह्वान करना है
उलूक ध्वनि से कण-कण को मुखरित करना है
दुआओं की आतिशबाजी ,
मीठे वचन की मिठास से
अतिथियों का स्वागत करना है
और कहना है
जीवन में उजाले - ही-उजाले हों

Dr. Amarjeet Kaunke said...

bahut hi piari kavita hai...

shama said...

Waah kitnee sundar shubhkamna bhejee hai aapne aapkee rachna dwara...'kavita' blog pe...!
Apka lekhan padhne aayee thee...par kisee karan ab nahee derse padh paungee..!
Meree orse unheen alfaazme aapko dheron shubhkamnayen!

विपिन बिहारी गोयल said...

लहरों की खामोशी और खाली नैय्या
समां बांध दिया आपने तो

ktheLeo said...

उस किनारेसे महरूम हैं लोग,
खामोश हैं लहरें जाने क्यों?

"एक शमा की सब वफ़ायें जब हवा से हो गयीं,
बे चिरागां रास्तों क लुत्फ़ ही जाता रहा."

" सच में " पर ktheleo.

वन्दना said...

behtreen khyalon ko sanjoya hai.

'sammu' said...

यह किनारा हो की चाहे हो कोई उस पार भी,
उल्फतों की एक नदी हो मौज हो जिसका सहारा .

उस किनारे के लिए खामोश सी कश्ती सजी है,
हैं अभागे लोग जो कर लेते हैं कोई किनारा .