अपनी उम्मीदें दफनाई
नींव तुम्हारे घरकी बनायी......
अपने लिए सपने कोई ,
कभी देखे नहीं ....
गर पलक झपकी भी,
पलकों ने झालर बुनी
ख्वाब आँखों के थे तुम्हारी......
मेरी तमन्ना कहाँ थी ?
गर पूरी नही हुई,
उसमे मेरी खता कहाँ थी?
क्यों इल्ज़ामे बेवफाई?
जब हर वफ़ा निभायी!...
मैं तो नींद गहरी ,
सोयी कभी? कभी नही!
दूर रहे हर आँधी,
ऐसी की निगेहबानी!
Tuesday, July 7, 2009
चाँदनी मन जलाये...
"दूरसे आसमाँ कितना मनोहारी लगे है ,
फिर भी , सर पे छत हो , क्यों लगे है ?
धूप के बिना जीवन नही ,पैर चाहे जलते हैं ,
चाँदनी मन जलाती है ,वही प्यारी क्यों लगे है?
फिर भी , सर पे छत हो , क्यों लगे है ?
धूप के बिना जीवन नही ,पैर चाहे जलते हैं ,
चाँदनी मन जलाती है ,वही प्यारी क्यों लगे है?
Monday, July 6, 2009
कौन डगर,ये कैसा सफर?
डरे, कुम्हलाये मनको क्या पता था?
ये डगर क्या , कौनसा रास्ता था?
वो किस मंजिल की ओर चली थी?
कौन शहर ,किस दिशा सफ़र चला ?
उसके पीका घर था, या बंदीशाला?
मनको क्या पता था?
किसे था, इंतज़ार उसका ?
आगे सपने थे या,
इक संसार पीड़ा का?
शर्मीली दुल्हन, पलकोंमे डर था,
आँसू छलकाना,या,
खुलके हँसना ,दोनों मना था !
सफर आगे, आगे चला था,
मनको क्या पता था?
मन बचपन में रुका पड़ा था,
वो नन्हीं, नन्हीं पग डंडियाँ,
उसे थामने दौड़ते दादा,
भूल पाना,क्या मुमकिन था..?
वो बाबुलकी सखियाँ, वो गलियाँ?
मनको कहाँ पता था?
मन पीछे, पीछे भाग रहा था,
अनजान डर जिसे घेर रहा था...
भयभीत मन, भरमा रहा था,
पीका नगर अब आ रहा था,
पीका नगर था , आनेवाला....
मनको कहाँ पता था??
एक चकित भरमाई दुल्हन की मनोदशा...जैसे नौका ने एक किनारा तो छोड़ दिया था...पर किस दिशा वो बह चली थी, कहाँ उसका दूसरा साहिल था, उसे ख़बर कहाँ?...?
ये डगर क्या , कौनसा रास्ता था?
वो किस मंजिल की ओर चली थी?
कौन शहर ,किस दिशा सफ़र चला ?
उसके पीका घर था, या बंदीशाला?
मनको क्या पता था?
किसे था, इंतज़ार उसका ?
आगे सपने थे या,
इक संसार पीड़ा का?
शर्मीली दुल्हन, पलकोंमे डर था,
आँसू छलकाना,या,
खुलके हँसना ,दोनों मना था !
सफर आगे, आगे चला था,
मनको क्या पता था?
मन बचपन में रुका पड़ा था,
वो नन्हीं, नन्हीं पग डंडियाँ,
उसे थामने दौड़ते दादा,
भूल पाना,क्या मुमकिन था..?
वो बाबुलकी सखियाँ, वो गलियाँ?
मनको कहाँ पता था?
मन पीछे, पीछे भाग रहा था,
अनजान डर जिसे घेर रहा था...
भयभीत मन, भरमा रहा था,
पीका नगर अब आ रहा था,
पीका नगर था , आनेवाला....
मनको कहाँ पता था??
एक चकित भरमाई दुल्हन की मनोदशा...जैसे नौका ने एक किनारा तो छोड़ दिया था...पर किस दिशा वो बह चली थी, कहाँ उसका दूसरा साहिल था, उसे ख़बर कहाँ?...?
Friday, July 3, 2009
दूर रेह्केभी ......
दूर रेह्केभी क्यों
इतने पास रहते हैं वो?
हम उनके कोई नही,
क्यों हमारे सबकुछ,
लगते रहेते हैं वो?
सर आँखोंपे चढाया,
अब क्यों अनजान,
हमसे बनतें हैं वो?
वो अदा थी या,
है ये अलग अंदाज़?
क्यों हमारी हर अदा,
नज़रंदाज़ करते हैं वो?
घर छोडा,शेहेर छोडा,
बेघर हुए, परदेस गए,
और क्या, क्या, करें,
वोही कहें,इतना क्यों,
पीछा करतें हैं वो?
खुली आँखोंसे नज़र
कभी आते नही वो!
मूंदतेही अपनी पलकें,
सामने आते हैं वो!
इस कदर क्यों सताते हैं वो?
कभी दिनमे ख्वाब दिखलाये,
अब क्योंकर कैसे,
नींदें भी हराम करते हैं वो?
जब हरेक शब हमारी ,
आँखोंमे गुज़रती हो,
वोही बताएँ हिकमत हमसे,
क्योंकर सपनों में आयेंगे वो?
सुना है, अपने ख्वाबों में,
हर शब मुस्कुरातें हैं वो,
कौन है,हमें बताओ तो,
उनके ख्वाबोंमे आती जो?
दूर रेह्केभी क्यों,
हरवक्त पास रहेते हैं वो?
शमा
इतने पास रहते हैं वो?
हम उनके कोई नही,
क्यों हमारे सबकुछ,
लगते रहेते हैं वो?
सर आँखोंपे चढाया,
अब क्यों अनजान,
हमसे बनतें हैं वो?
वो अदा थी या,
है ये अलग अंदाज़?
क्यों हमारी हर अदा,
नज़रंदाज़ करते हैं वो?
घर छोडा,शेहेर छोडा,
बेघर हुए, परदेस गए,
और क्या, क्या, करें,
वोही कहें,इतना क्यों,
पीछा करतें हैं वो?
खुली आँखोंसे नज़र
कभी आते नही वो!
मूंदतेही अपनी पलकें,
सामने आते हैं वो!
इस कदर क्यों सताते हैं वो?
कभी दिनमे ख्वाब दिखलाये,
अब क्योंकर कैसे,
नींदें भी हराम करते हैं वो?
जब हरेक शब हमारी ,
आँखोंमे गुज़रती हो,
वोही बताएँ हिकमत हमसे,
क्योंकर सपनों में आयेंगे वो?
सुना है, अपने ख्वाबों में,
हर शब मुस्कुरातें हैं वो,
कौन है,हमें बताओ तो,
उनके ख्वाबोंमे आती जो?
दूर रेह्केभी क्यों,
हरवक्त पास रहेते हैं वो?
शमा
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Thursday, July 2, 2009
१०० वीं पोस्ट "कविता"पर!
शमा जी ,
आप के Blogg की 100 वीं पोस्ट है, मैं नही जानता के आप को पसन्द आयेगा कि नहीं. मैं ये liberty ले रहा हूं आप ने "कविता" पर मुझे coauther का right दिया है, तो इतनी liberty मैं ले हई सकता हूं. उम्मीद है कलाम आपको और आप के Blog के पाठकों को पसंद आयेगा.
हाथ में इबारतें,लकीरें थीं,
सावांरीं मेहनत से तो वो तकदीरें थी।
जानिबे मंज़िल-ए-झूंठ ,मुझे भी जाना था,
पाँव में सच की मगर जंज़ीरें थीं।
मैं तो समझा था फूल ,बरसेंगे,
उनके हाथों में मगर शमशीरें थीं।
खुदा समझ के रहे सज़दे में ताउम्र जिनके,
गौर से देखा तो , वो झूंठ की ताबीरे॑ थीं।
पिरोया दर्द के धागे से तमाम लफ़्ज़ों को,
मेरी ग़ज़लें मेरे ज़ख़्मों की तहरीरें थीं।
पीछेसे वार मंज़ूर नही...
अँधेरों इसके पास आना नही,
बुझनेपे होगी,"शमा"बुझी नही,
बुलंद एकबार ज़रूर होगी,
मत आना चपेट में इसकी,
के ये अभी बुझी नही!
दिखे है, जो टिमटिमाती,
कब ज्वाला बनेगी,करेगी,
बेचिराख,इसे ख़ुद ख़बर नही!
उठेगी धधक , बुझते हुएभी,
इसे पीछेसे वार मंज़ूर नही!
कोई इसका फानूस नही,
तेज़ हैं हवाएँ, उठी आँधी,
बताओ,है शमा कोई ऐसी,
जो आँधीयों से लड़ी नही?
ऐसी,जो आजतक बुझी नही?
सैंकडों जली,सैंकडों,बुझी!
हुई बदनाम ,गुमनाम कभी,
है शामिल क़ाफ़िले रौशनी ,
जिन्हें,सदियों सजाती रही!
एक बुझी,तो सौ जली..!
बुझनेपे होगी,"शमा"बुझी नही,
बुलंद एकबार ज़रूर होगी,
मत आना चपेट में इसकी,
के ये अभी बुझी नही!
दिखे है, जो टिमटिमाती,
कब ज्वाला बनेगी,करेगी,
बेचिराख,इसे ख़ुद ख़बर नही!
उठेगी धधक , बुझते हुएभी,
इसे पीछेसे वार मंज़ूर नही!
कोई इसका फानूस नही,
तेज़ हैं हवाएँ, उठी आँधी,
बताओ,है शमा कोई ऐसी,
जो आँधीयों से लड़ी नही?
ऐसी,जो आजतक बुझी नही?
सैंकडों जली,सैंकडों,बुझी!
हुई बदनाम ,गुमनाम कभी,
है शामिल क़ाफ़िले रौशनी ,
जिन्हें,सदियों सजाती रही!
एक बुझी,तो सौ जली..!
4 comments:
Wednesday, July 1, 2009
जादू का सच!
क्या कहा?, तुम जादू दिखाओगे!
जाने दो फ़िर हमें बेवकूफ़ बनाओगे.
वख्त आने पे बरसात होती है,
ये बात तुम प्यासों को बताओगे.
मेरे ज़ख्मों को बे मरहम ही रहने दो,
ये खुले , तो तुम बिखर जाओगे.
बम धमाके में,वो ही क्यों मरा?
उसकी मां को ,ये कैसे समझाओगे.
मैने माना पढा दोगे, सब लोगों को
जो काबिल भूलें है,सब,उन्हें क्या बताओगे.
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शमा जी,
बहुत ही अच्छी पंक्तियाँ है :-
सैंकडों जली,सैंकडों,बुझी!
हुई बदनाम ,गुमनाम कभी,
है शामिल क़ाफ़िले रौशनी ,
जिन्हें,सदियों सजाती रही!
एक बुझी,तो सौ जली..!
सादर,
मुकेश कुमार तिवारी
उठेगी धधक , बुझते हुएभी,
इसे पीछेसे वार मंज़ूर नही!
क्या बात है सच को बहुत ही खुबसूरत अंदाज से ब्यक्त किया है आप ने
शमा जी,
आपने बहुत ही जर्रानवाजी की इस ख़ाकसार की, शुक्रिया।
वैसे, मैं तो हमेशा यही चाहता रहा कि मैं जो लिखूं वह पढा जाये और अनुभव किया जाये। आपकी टिप्पणी मेरी सोच को सार्थकता प्रदान करती लगी।
आपका "कवितायन" पर स्वागत है और मुझे भी आपकी सार्थक टिप्पणियों का इंतजार रहेगा। शमा की कवितायें बुलंदियों को हासिल करें यही दुआयें है।
सादर,
मुकेश कुमार तिवारी
ग़ालिब ने कहा
शम्मा हर हाल में जलती है सहर होने तक ......
होने से पहले सहर
मिटने से पहले अय शमा
खोल तो राज़ कोई
रात के अफसानो का .
तू बुझे जब भी बुझे
बुझने से पहले लेकिन
कुछ फ़साने तो सुना
जल चुके परवानों का
उनको मालूम भी था
देख के रोशन तुझको
रोशनी ही है पता
मिट चुके अरमानों का
वो ही फानूस थे
मिट कर तुझे बुझने ना दिया
शान रक्खी थी धरम
रक्खा था दीवानों का