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Sunday, July 26, 2009


उफ़्फ़क पे जाके शायद, मिल जाते,
मैं अगर आसमां, और तू ज़मी होता

इस दुनियां में सब मुसाफ़िर हैं,
कोई मुस्तकिल मकीं नही होता
.


सौ बार आईना देख आया,
फ़िर भी क्यूं खुद पर यकीं नही होता.


दिल के टुकडे बहुत हुये होगें,
यूं ही कोई गमनशीं नहीं होता!

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Tuesday, July 7, 2009

चाँदनी मन जलाये...

"दूरसे आसमाँ कितना मनोहारी लगे है ,
फिर भी , सर पे छत हो , क्यों लगे है ?

धूप के बिना जीवन नही ,पैर चाहे जलते हैं ,
चाँदनी मन जलाती है ,वही प्यारी क्यों लगे है?

Saturday, April 4, 2009

भटकी हुई बदरी....

हूँ भटकती हुई एक बदरी,
अपनेही बंद आसमानोंकी,
जिसे बरसनेकी इजाज़त नही....

वैसेतो मुझमे, नीरभी नही,
बिजुरीभी नही,युगोंसे हूँ सूखी,
पीछे छुपा कोई चांदभी नही....

चाहत एक बूँद नूरकी,
आदी हूँ अन्धेरोंकी,फिरभी,
सदियोंसे वो मिली नही....

के मै हूँ भटकी हुई एक बदरी,
अपनेही बंद आसमानोंकी....
मेरे लिए तमन्नाएँ लाज़िम नही....

शमा।