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Tuesday, July 7, 2009

क्यों इल्ज़ामे बेवफाई ?

अपनी उम्मीदें दफनाई
नींव तुम्हारे घरकी बनायी......

अपने लिए सपने कोई ,
कभी देखे नहीं ....

गर पलक झपकी भी,
पलकों ने झालर बुनी

ख्वाब आँखों के थे तुम्हारी......
मेरी तमन्ना कहाँ थी ?

गर पूरी नही हुई,
उसमे मेरी खता कहाँ थी?

क्यों इल्ज़ामे बेवफाई?
जब हर वफ़ा निभायी!...

मैं तो नींद गहरी ,
सोयी कभी? कभी नही!

दूर रहे हर आँधी,
ऐसी की निगेहबानी!

Monday, March 23, 2009

खोयीसी बिरहन...

खोयीसी बिरहन जब
उस ऊँचे टीलेपे
सूने महल के नीचे
या फिर खंडहर के पीछे
गीत मिलन के गाती है,
पत्थर दिल रूह भी
फूट फूट के रोती है।
हर वफ़ा शर्माती है
जब गीत वफ़ाके सुनती है।
खेतोमे,खालिहानोमे
अंधेरोंमे याकि
चांदनी रातोमे
सूखे तालाब के परे
या नदियाकी मौजोंपे
कभी जंगल पहाडोंमे
मीलों फैले रेगिस्तानोमे
या सागरकी लहरोंपे
जब उसकी आवाज़
लहराती है,
हर लेहेर थम जाती है
बिजलियाँ बदरीमे
छुप जाती हैं
हर तरफ खामोशी ही
खामोशी सुनायी देती है।
मेरी दादी कहती है
सुनी थी ये आवाजें
उनकीभी दादीने॥