अपनी उम्मीदें दफनाई
नींव तुम्हारे घरकी बनायी......
अपने लिए सपने कोई ,
कभी देखे नहीं ....
गर पलक झपकी भी,
पलकों ने झालर बुनी
ख्वाब आँखों के थे तुम्हारी......
मेरी तमन्ना कहाँ थी ?
गर पूरी नही हुई,
उसमे मेरी खता कहाँ थी?
क्यों इल्ज़ामे बेवफाई?
जब हर वफ़ा निभायी!...
मैं तो नींद गहरी ,
सोयी कभी? कभी नही!
दूर रहे हर आँधी,
ऐसी की निगेहबानी!
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