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Wednesday, November 30, 2011

दुल्हनिया...!


ना,ना,न छूना घूंघटा,
सहमी सिमटी है दुल्हनिया,
अभी छलके हैं इस के नैना,
यादों में है बाबुल अपना!

आँखों से कजरा बह गया,
बालों में गजरा मुरझाया,
हैं हिनाभरी हथेलियाँ,
याद आ रही हैं सहेलियाँ...

दादी औ माँ में उलझा है ज़ेहन,
उसमे बसा है नैहरका आँगन,
धूप में बरसती सावनी फुहार,
फूल बरसाता हारसिंगार...

गीली मिट्टी पे मोलश्री के फूल,
नीम के तिनकों में पिरोये हार,
मेलों के तोहफे,बहनका दुलार,
अभी यही है,इसका सिंगार!

Wednesday, October 20, 2010

दुल्हनिया...!

ना,ना,न छूना घूंघटा,
सहमी सिमटी है दुल्हनिया,
अभी छलके हैं इस के नैना,
यादों में है बाबुल अपना!

आँखों से कजरा बह गया,
बालों में गजरा मुरझाया,
हैं हिनाभरी हथेलियाँ,
याद आ रही हैं सहेलियाँ...

दादी औ माँ में उलझा है ज़ेहन,
उसमे बसा है नैहरका आँगन,
धूप में बरसती सावनी फुहार,
फूल बरसाता हारसिंगार...

गीली मिट्टी पे मोलश्री के फूल,
नीम के तिनकों में पिरोये हार,
मेलों के तोहफे,बहनका दुलार,
अभी यही है,इसका सिंगार!

Monday, July 6, 2009

कौन डगर,ये कैसा सफर?

डरे, कुम्हलाये मनको क्या पता था?
ये डगर क्या , कौनसा रास्ता था?
वो किस मंजिल की ओर चली थी?
कौन शहर ,किस दिशा सफ़र चला ?
उसके पीका घर था, या बंदीशाला?
मनको क्या पता था?

किसे था, इंतज़ार उसका ?
आगे सपने थे या,
इक संसार पीड़ा का?
शर्मीली दुल्हन, पलकोंमे डर था,
आँसू छलकाना,या,
खुलके हँसना ,दोनों मना था !
सफर आगे, आगे चला था,
मनको क्या पता था?

मन बचपन में रुका पड़ा था,
वो नन्हीं, नन्हीं पग डंडियाँ,
उसे थामने दौड़ते दादा,
भूल पाना,क्या मुमकिन था..?
वो बाबुलकी सखियाँ, वो गलियाँ?
मनको कहाँ पता था?

मन पीछे, पीछे भाग रहा था,
अनजान डर जिसे घेर रहा था...
भयभीत मन, भरमा रहा था,
पीका नगर अब आ रहा था,
पीका नगर था , आनेवाला....
मनको कहाँ पता था??

एक चकित भरमाई दुल्हन की मनोदशा...जैसे नौका ने एक किनारा तो छोड़ दिया था...पर किस दिशा वो बह चली थी, कहाँ उसका दूसरा साहिल था, उसे ख़बर कहाँ?...?