Wednesday, March 16, 2011

होली के रंग!





चंदन रंग गुलाल हमारे पास नही,
उसके चिकने गाल हमारे पास नहीं।


होली कैसे होगी इस फ़ागुन सोचो
साली,सरहज ससुराल हमारे पास नही


मंहगाई की गोरी कितनी सुन्दर है,
पर पैसो की टकसाल हमारे पास नही।


राजा पहुंच गये २ जी की मन्ज़िल को,
कैसी भोली जनता जिसे मलाल नही।

Friday, March 11, 2011

ज़हर का इम्तेहान.....

ज़हर का इम्तेहान.....

बुज़ुर्गोने कहा, ज़हरका,
इम्तेहान मत लीजे,
हम क्या करे गर,
अमृतके नामसे हमें
प्यालेमे ज़हर दीजे !
अब तो सुनतें हैं,
पानीभी बूँदभर चखिए,
गर जियें तो और पीजे !
हैरत ये है,मौत चाही,
ज़हर पीके, नही मिली,
ज़हर में मिलावट मिले
तो बतायें, क्या कीजे?
तो सुना, मरना हैही,
तो बूँदभर अमृत पीजे,
जीना चाहो , ज़हर पीजे!

Monday, February 28, 2011

दुआ बहार की! "कविता" पर भी!




क्या कह दूँ के तुम्हें करार आ जाये,
मेरी बातों पे तुम्हें ऎतबार आ जाये॥

दिल इस दुनिया से क्यूँ नहीं भरता,
उनकी बेरूखी पे भी प्यार आ जाये।

दर्द इतने मैं कहाँ छुपाऊँ भला,
मौत से कहो एक बार आ जाये।

वीरानियाँ भी तो तेरा हिस्सा हैं,
या खुदा इधर भी बहार आ जाये।

Tuesday, February 22, 2011

था आफताब भी....

था आफताब भी ,था माहताब भी!
तब अँधेरे घनेरे थे,ऐसा नही,
थे रौशनी के हज़ार क़ाफ़िले भी!
सर पर के बोझ का दोष नही,
पगतले तिमिर का आक्रोश नही,
खुली सराय बुला रही थी!
चमन में हलचली थी मची,
संभलो लुटेरा है,यहीँ कहीँ!
न सुननेकी मैंने जो ठानी थी!
मै तो उजालों में ठगी जानी थी!

Friday, February 4, 2011

गुफ़्तगू बे वजह की!कविता पर भी!



ज़रा कम कर लो,
इस लौ को,
उजाले हसीँ हैं,बहुत!
मोहब्बतें,
इम्तिहान लेती हैं
मगर! 

पहाडी दरिया का किनारा,
खूबसूरत है मगर,
फ़िसलने पत्थर पे
जानलेवा 
न हो कहीं!

मैं नही माज़ी,
मुस्तकबिल भी नही,
रास्ते अक्सर
तलाशा करते हैं
गुमशुदा को!मगर!

किस्मतें जब हार कर,
घुटने टिका दे,
दर्द साया बन के,
आता है तभी!


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Monday, January 31, 2011

क़हत..


हर क़हत में हम सैलाब ले आये,
आँसूं सूख गए, क़हत बरक़रार रहे..

कहनेको तो धरती निर्जला है,
ज़रा दिलकी सरज़मीं देखो, कैसी है?

दर्द के हजारों बीज बोये हुए हैं,
पौधे पनप रहे हैं,फसल माशाल्लाह है!

Friday, December 31, 2010

गुफ़्तगू बे वजह! दूसरा बयान! सिर्फ़ "कविता" पर!

मोहब्बतों की कीमतें चुकाते,
मैने देखे है,
तमाम जिस्म और मन,
अब नही जाता मैं कभी
अरमानो की कब्रगाह की तरफ़।

दर्द बह सकता नहीं,
दरिया की तरह,
जाके जम जाता है,
लहू की मांनिद,
थोडी देर में!

अश्क से गर कोई
बना पाता नमक,
ज़िन्दगी खुशहाल,
कब की हो गई होती।

रिश्तो के खिलौने,
सिर्फ़ बहला सकते है,
दुखी मन को,
ज़िन्दगी गुजारने को,
पैसे चाहिये!!!!!!


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