मोहब्बतों की कीमतें चुकाते,
मैने देखे है,
तमाम जिस्म और मन,
अब नही जाता मैं कभी
अरमानो की कब्रगाह की तरफ़।
दर्द बह सकता नहीं,
दरिया की तरह,
जाके जम जाता है,
लहू की मांनिद,
थोडी देर में!
अश्क से गर कोई
बना पाता नमक,
ज़िन्दगी खुशहाल,
कब की हो गई होती।
रिश्तो के खिलौने,
सिर्फ़ बहला सकते है,
दुखी मन को,
ज़िन्दगी गुजारने को,
पैसे चाहिये!!!!!!
For original thought please also visit www.sachmein.blogspot.com "सच में"
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Friday, December 31, 2010
Friday, May 8, 2009
क्यों ये रंग दिखाए?
किस्मत ने क्या रंग दिखाए!
देख, परख हम दंग रह गए!
सुना था बड़े खेल खेलती है,
कब लगाई शर्त उससे,
हम वैसेभी थके हुए थे,
फिर क्यों ये रंग दिखाए?
ज़रूरी तो नही था,
सरेआम हराती हमें,
सरेआम बनाती तमाशा,
बेखब्र मूँदके पलकें,
हम तो हारे बैठे थे,
क्यों ये तमाचे लगाये?
कब कहा उससे,
कब दी चुनौती उसे?
कौनसे सबक थे,
जो हम सीखे नही थे?
इतने तो पागल नही थे,
देखे हुए रंग, फिरसे दिखाए!
उठ, सीख "शमा" कुछ सीख
जो याद रहे अगले जनमतक...!
देख, परख हम दंग रह गए!
सुना था बड़े खेल खेलती है,
कब लगाई शर्त उससे,
हम वैसेभी थके हुए थे,
फिर क्यों ये रंग दिखाए?
ज़रूरी तो नही था,
सरेआम हराती हमें,
सरेआम बनाती तमाशा,
बेखब्र मूँदके पलकें,
हम तो हारे बैठे थे,
क्यों ये तमाचे लगाये?
कब कहा उससे,
कब दी चुनौती उसे?
कौनसे सबक थे,
जो हम सीखे नही थे?
इतने तो पागल नही थे,
देखे हुए रंग, फिरसे दिखाए!
उठ, सीख "शमा" कुछ सीख
जो याद रहे अगले जनमतक...!
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