किस्मत ने क्या रंग दिखाए!
देख, परख हम दंग रह गए!
सुना था बड़े खेल खेलती है,
कब लगाई शर्त उससे,
हम वैसेभी थके हुए थे,
फिर क्यों ये रंग दिखाए?
ज़रूरी तो नही था,
सरेआम हराती हमें,
सरेआम बनाती तमाशा,
बेखब्र मूँदके पलकें,
हम तो हारे बैठे थे,
क्यों ये तमाचे लगाये?
कब कहा उससे,
कब दी चुनौती उसे?
कौनसे सबक थे,
जो हम सीखे नही थे?
इतने तो पागल नही थे,
देखे हुए रंग, फिरसे दिखाए!
उठ, सीख "शमा" कुछ सीख
जो याद रहे अगले जनमतक...!
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