Wednesday, March 16, 2011

होली के रंग!





चंदन रंग गुलाल हमारे पास नही,
उसके चिकने गाल हमारे पास नहीं।


होली कैसे होगी इस फ़ागुन सोचो
साली,सरहज ससुराल हमारे पास नही


मंहगाई की गोरी कितनी सुन्दर है,
पर पैसो की टकसाल हमारे पास नही।


राजा पहुंच गये २ जी की मन्ज़िल को,
कैसी भोली जनता जिसे मलाल नही।

8 comments:

vandan gupta said...

सही कह रहे है……………होली की हार्दिक शुभकामनाएँ..

वाणी गीत said...

महंगाई की गोरी कितनी सुन्दर है ,
पर पैसों की टकसाल हमारे पास नहीं ...
क्या बात है !

धीरेन्द्र सिंह said...

कल्पना कि उड़ान और यथार्थ की ज़मीन के पाटों में दौडती यह कविता कभी मन को झंकृत कर रही है तो कभी झकझोर रही है. होली खेलते वक्त भी अक्सर ऐसे अनुभवों से गुजरना पड़ता है कभी किसी के साथ प्रित्भारी होली होती है तो किसी के साथ कड़वाहट सी स्वाद देती होली लगती है. होली कैसे होगी यह प्रश्न तो सही है किन्तु जब होली आएगी तो रंग भी जरुर उड़ेंगे. होली की शुभकामनाएं.

shama said...

राजा पहुंच गये २ जी की मन्ज़िल को,
कैसी भोली जनता जिसे मलाल नही।
wah!Gazab kalpakta rahtee hai aapkee har rachana me!
Holiki haardik badhayi!

ktheLeo (कुश शर्मा) said...

’होलिका वध’ शुभ हो!
’मदनोत्सव’और रंगपर्व की सभी को बधाई

mridula pradhan said...

mazedar.....

CSK said...

aapki holi aur meri bilkul aisi hi hai...bahut achhe se shabdon ko piroya hai aapne...agar paas me koi hai to wo mahangaai ki GORI....maza aa gaya padhkar...

hamarivani said...

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