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Friday, March 11, 2011

ज़हर का इम्तेहान.....

ज़हर का इम्तेहान.....

बुज़ुर्गोने कहा, ज़हरका,
इम्तेहान मत लीजे,
हम क्या करे गर,
अमृतके नामसे हमें
प्यालेमे ज़हर दीजे !
अब तो सुनतें हैं,
पानीभी बूँदभर चखिए,
गर जियें तो और पीजे !
हैरत ये है,मौत चाही,
ज़हर पीके, नही मिली,
ज़हर में मिलावट मिले
तो बतायें, क्या कीजे?
तो सुना, मरना हैही,
तो बूँदभर अमृत पीजे,
जीना चाहो , ज़हर पीजे!

Thursday, June 10, 2010

"कविता" पर भी! पेड! "बरगद" का! (www.sachmein.blogspot.com)


आपने बरगद देखा है,कभी!

जी हां, ’बरगद’, 

बरर्गर नहीं,

’ब र ग द’ का पेड!

माफ़ करें,
आजकल शहरों में,
पेड ही नहीं होते,
बरगद की बात कौन जाने,

और ये जानना तो और भी मुश्किल है कि,
बरगद की लकडी इमारती नहीं होती,

माने कि, जब तक वो खडा है,
काम का है,

और जिस दिन गिर गया,
पता नही कहां गायब हो जाता है,

मेरे पिता ने बताया था ये सत्य एक दिन!
जब वो ज़िन्दा थे!

अब सोचता हूं, 

मोहल्ले के बाहर वाली टाल वाले से पूछुंगा कभी,
क्या आप ’बरगद’ की लकडी खरीदते हो?


भला क्यों नहीं?


क्या बरगद की लकडी से ईमारती सामान नहीं बनता?


 पता नहीं क्यों!


Wednesday, December 2, 2009

तीरगी का सच!

May be little late for anniversary of 26/11 notwithstanding रचना आप के सामने है.(थोडी पुरानी सही पर बात एक दम खरी है!) :

इस तीरगी और दर्द से, कैसे लड़ेंगे हम,
 मौला तू ,रास्ता दिखा अपने ज़माल से.


मासूम लफ्ज़ कैसे, मसर्रत अता करें,
जब भेड़िया पुकारे मेमने की खाल से.


चारागर हालात मेरे, अच्छे बता गया,
कुछ नये ज़ख़्म मिले हैं मुझे गुज़रे साल से.


लिखता नही हूँ शेर मैं, अब इस ख़याल से,
किसको है वास्ता यहाँ, अब मेरे हाल से. 

और ये दो शेर ज़रा मुक़्तलिफ रंग के:

ऐसा नहीं के मुझको तेरी याद ही ना हो,
 पर बेरूख़ी सी होती है,अब तेरे ख़याल से.


दो अश्क़ उसके पोंछ के क्या हासिल हुया मुझे?
खुश्बू नही गयी है,अब तक़ रूमाल से.


Also available on "सच में" at www.sachmein.blogspot.com





Saturday, September 5, 2009

इस तरह आ..

सुन मौत!तू इसतरह आ
हवाका झोंका बन,धीरेसे आ!
ज़र्रे की तरह मुझे उठा ले जा
कोई आवाज़ हो ना
पत्ता कोई बजे ना
चट्टानें लाँघ के दूर लेजा !
मेरे प्रीतम की तरह आ,
मुझे बाहों में उठा ले,
पलकों को चूम ले,
माँग में मोती भर,
मेरी माँग चूम ले!
किसीको पता लगे ना
डाली कोई हिले ना
आ,मेरे पास आ,
एक सखी बन के आ,
थाम ले मुझे
सीनेसे लगा ले,
गोदीमे सुला दे,
थक गयी हूँ बोहोत,
मीठी सी लोरी,
गुनगुना के सुना दे!
मेरी माँ बन के आ ,
आँचल मे छुपा ले !
आ,तू आ, गलेसे लगा ले...

Thursday, June 18, 2009

कीमत हँसी की.....

हर हँसीकी क़ीमत
अश्कोंसे चुकायी हमने
पता नही और कितना
कर्ज़ रहा है बाक़ी
आँसू हैं, कि, थमते नही!

जिन्हे खोके आँखें रोयीं,
तनहा हुए, खातिर जिनकी,
वो कहाँ है येभी
अब हमे ख़बर नही,
दुआ है निकलती
उनके लिए, फिरभी......

पलके मूँद के भी,
नींदे हैं उड़ जातीं,
वीरान बस्तीमे दिलकी
वो बसते हैं आजभी!
तके है राह आज भी...

सिर्फ़ दरवाज़े नही,
हर खिड़की, बंद कर ली,
ना है, दरार कहीँ,
दूसरा आये कोई,
गुंजाईश रखी नही !

ये है,कैसी हैरानी,
हमारी दूर से भी
ख़बर ख़ूब है रहती
हर हँसी पे हमारी,
रखी है पहरेदारी...

होटोंपे आये तो सही
सौगाते ग़म औ'मायूसी,
बसी है, हैं पासही ...!
चाहे हो हल्की-सी
झपटी जाए,वो हँसी...

Thursday, March 19, 2009

मान गए तुझे, ज़िंदगी...!

"मान गयी तुझे अए ज़िंदगी,
तू नही तो कुछभी नही!
क्या चीज़ है तू ,तुझे पता नही,
तू है तो है वफ़ा, तू नही ,
मौत भी कहाँ !के तू है मिलती,
कभी, कभी, मौत तो है हरजाई!
तू दे गर इजाज़त,
तभी आ सके वो, तू कहे रुक,
तो क्या मजाल के आगे बढे ,
एक क़दम भी...नही,नही,
हरगिज़ नही, हरगिज़ नही....!
तुझे चाहें कोई
तो नज़र है आती,
मौत को चाहें हम कितनाभी,
उसे फर्क पड़ता नही,
वो बिन तेरे चाहे, मिलती नही!!
वो इतनी पेश कीमती नही!!"

Sunday, March 8, 2009

ना ख़ुदा ने सताया.....

ना खुदाने सताया...

ना खुदाने सताया
ना मौतने रुलाया
रुलाया तो ज़िन्दगीने
माराभी उसीने
ना शिकवा खुदासे
ना गिला मौतसे
थोडासा रेहेम माँगा
तो वो जिन्दगीसे
वही ज़िद करती है,
जीनेपे अमादाभी
वही करती है...
मौत तो राहत है,
वो पलके चूमके
गेहेरी नींद सुलाती है
ये तो ज़िंदगी है,
जो नींदे चुराती है
पर शिकायतसे भी
डरती हूँ उसकी,
गर कहीँ सुनले,
पलटके एक ऐसा
तमाचा जड़ दे
ना जीनेके काबिल रखे
ना मरनेकी इजाज़त दे....
शमा