जलती ssss रही, जलतीही रही,
ना उजाला हुआ,
ना अँधेरा गया,
वो जलती रही,
ज्योती जलती रही...
रात रुक-सी गयी,
चांदभी ना खिला,
टिमटिमाये चंद तारें कहीं,
पर रौशनी नही,
वो जलती रहीssssss
ना मंज़िल दिखी,
ना राहेँ मिली,
ना हवासे बुझी,
ना तूफाँ से बुझी,
आह उसने भरीssssss
उसी आह्से वो बुझी....
वो खुदही बुझी,
वो खुदही बुझीssssss
ज्योती बुझही गयीssssss
ज्योती बुझही गयी,
तूफानसे नही, वो खुदही बुझी...
आखरी साँस तक
आखरी आस तक ,
उसने आहें भरी,
उसने आहें भरी ssssss,
जब सवेरा हुआ,
उसने देखा नही,
वो रहीही नही,
वो रहीही नही sssss
वो रहीही नही sssss
इस गीतमे मन्द्र सप्तक से लेके तार सप्तक का प्रयोग किया जा सकता है...बल्कि तभी...एक "haunting" qaulity इस गीतमे आयेगी, ऐसा मुझे महसूस होता है.....मै ना तो composer हूँ, ना संगीत का ज्ञान रखती हूँ...सिर्फ़ गुनगुनाके देखा तो ऐसा महसूस हुआ...
Tuesday, April 28, 2009
Monday, April 27, 2009
सिला मिल गया....
बेपनाह मुहोब्बतका सिला मिल गया,
जिन पनाहोंमे दिल था,
वही बेदिल,बे पनाह कर गया...
मेरीही जागीरसे, बेदखल कर गया...!
मिल गया, मुझे सिला मिल गया....
दुआओं समेत, सब कुछ ले गया,
हमें पागल करार गया,
दुनियादार था, रस्म निभा गया,
ज़िंदगी देनेवाला ख़ुद मार गया,
मिल गया, मुझे सिला मिल गया...
तुम हो सबसे जुदा, कहनेवाला,
हमें सबसे जुदा कर गया,
मै खतावार हूँ तुम्हारा,
कहनेवाला, खुदको बरी कर गया,
मिल गया मुझे सिला मिल गया...
ता क़यामत इंतज़ार करूँगा,
कहके, चंद पलमे चला गया,
ना मिली हमारी बाहें,तो क्या,
वो औरोंकी बाहोंमे चला गया..
मिल गया ,मुझे सिला मिल गया...
मौत मारती तो बेहतर होता,
हमें मरघट तो मिला होता,
उजडे ख्वाब मेरे, उजड़ी बस्तियाँ,
वो नयी दुनियाँ बसाने चल दिया...
मिल गया, मुझे सिला मिल गया....
कैद्से छुडाने वो आया था,
मेरे परतक काटके निकल गया,
औरभी दीवारें ऊँची कर गया...
वो मेरा प्यार था, या सपना था,
दे गया, मुझे सिला दे गया...
मुश्किलोंमे साथ देनेका वादा ,
सिर्फ़ वादाही रह गया,
आसाँ राहोंकी तलाशमे निकल गया...
ज़िंदगी और पेचीदा कर गया...
दे गया, मुझे सिला दे गया...
जिन पनाहोंमे दिल था,
वही बेदिल,बे पनाह कर गया...
मेरीही जागीरसे, बेदखल कर गया...!
मिल गया, मुझे सिला मिल गया....
दुआओं समेत, सब कुछ ले गया,
हमें पागल करार गया,
दुनियादार था, रस्म निभा गया,
ज़िंदगी देनेवाला ख़ुद मार गया,
मिल गया, मुझे सिला मिल गया...
तुम हो सबसे जुदा, कहनेवाला,
हमें सबसे जुदा कर गया,
मै खतावार हूँ तुम्हारा,
कहनेवाला, खुदको बरी कर गया,
मिल गया मुझे सिला मिल गया...
ता क़यामत इंतज़ार करूँगा,
कहके, चंद पलमे चला गया,
ना मिली हमारी बाहें,तो क्या,
वो औरोंकी बाहोंमे चला गया..
मिल गया ,मुझे सिला मिल गया...
मौत मारती तो बेहतर होता,
हमें मरघट तो मिला होता,
उजडे ख्वाब मेरे, उजड़ी बस्तियाँ,
वो नयी दुनियाँ बसाने चल दिया...
मिल गया, मुझे सिला मिल गया....
कैद्से छुडाने वो आया था,
मेरे परतक काटके निकल गया,
औरभी दीवारें ऊँची कर गया...
वो मेरा प्यार था, या सपना था,
दे गया, मुझे सिला दे गया...
मुश्किलोंमे साथ देनेका वादा ,
सिर्फ़ वादाही रह गया,
आसाँ राहोंकी तलाशमे निकल गया...
ज़िंदगी और पेचीदा कर गया...
दे गया, मुझे सिला दे गया...
Saturday, April 25, 2009
Sunday, April 19, 2009
वो सपना याद आया....
सूरजने जब पूरबाको चूमा,
लजाया मुखडा रक्तिम हुआ....
वही उष:काल कहलाया...
जब सूरजने उसको चूमा....
वही रंग मैंने हथेलियोंपे सजाया,
सुर्ख, खिरामा, वो बना,रंगे हिना !
जब उन्होंने घूँघट का पट खोला,
उन हाथोंने अपना चेहरा छुपाया!
जब माँग चूमी उन्होंने,
भर दिए अनगिनत सितारे,
पूरा हुआ सिंगार मेरा...
जब छुआ चेहरा मेरा....
शर्माते हुए इक किरन खिली,
लाजकी पंखुडी खुल गयी,
भरमाई परिणीता गठरी बनी...
बाहोंका हार गलेमे पाया...!
किस्मतको,उसीपे रश्क हुआ,
वो सपना था,सच कब हुआ?
बरसों बाद ख्वाबोंका लम्हा,
मुझे सताने क्यों लौट आया?
टूटे सपनेने कितना थकाया,
जितना जोड़ा, उतना बिखरा,
दिल उसे क्यों नही भूला?
जिसने मुझे इतना रुलाया?
जो कभी नही सजा,ऐसा,
रंगे हिना क्यों याद आया? ?
लजाया मुखडा रक्तिम हुआ....
वही उष:काल कहलाया...
जब सूरजने उसको चूमा....
वही रंग मैंने हथेलियोंपे सजाया,
सुर्ख, खिरामा, वो बना,रंगे हिना !
जब उन्होंने घूँघट का पट खोला,
उन हाथोंने अपना चेहरा छुपाया!
जब माँग चूमी उन्होंने,
भर दिए अनगिनत सितारे,
पूरा हुआ सिंगार मेरा...
जब छुआ चेहरा मेरा....
शर्माते हुए इक किरन खिली,
लाजकी पंखुडी खुल गयी,
भरमाई परिणीता गठरी बनी...
बाहोंका हार गलेमे पाया...!
किस्मतको,उसीपे रश्क हुआ,
वो सपना था,सच कब हुआ?
बरसों बाद ख्वाबोंका लम्हा,
मुझे सताने क्यों लौट आया?
टूटे सपनेने कितना थकाया,
जितना जोड़ा, उतना बिखरा,
दिल उसे क्यों नही भूला?
जिसने मुझे इतना रुलाया?
जो कभी नही सजा,ऐसा,
रंगे हिना क्यों याद आया? ?
Saturday, April 18, 2009
नही जुस्तजू हमें....
जिसे हर रात चाहिए
नयी चाँदनी, आँगन नए,
हर शाम लबोंके जाम नए,
जिस्म नए, हरवक्त नयी बाहें,
इक रातकी बदरीसे डरके,
जो तलाशे उजाले नए,
उम्र गुजार देंगे अमावस में ,
ऐसे चाँदकी नही जुस्तजू हमें...
कृष्ण पक्षके के स्याह अंधेरे
बने रहनुमा हमारे,
कई राज़ डरावने,
आ गए सामने, बन नजारे,
बंद चश्म खोल गए,
सचके साक्षात्कार हो गए,
हम उनके शुक्रगुजार बन गए...
बेहतर हैं यही साये,
जिसमे हम हो अकेले,
ना रहें ग़लत मुगालते,
मेहेरबानी, ये करम
बड़ी शिद्दतसे वही कर गए,
चाहे अनजानेमे किए,
हम आगाह तो हो गए....
जो नही थे माँगे हमने,
दिए खुदही उन्होंने वादे,
वादा फरोशी हुई उन्हीसे,
बर्बादीके जश्न खूब मने,
ज़ोर शोरसे हमारे आंगनमे...
इल्ज़ाम सहे हमीने...
ऐसेही नसीब थे हमारे....
अब न रहे कोई शिकवे,
बेहतर हैं यही साये,
जिनमे हम हो अकेले,
गंध आती है, उस उतरन में,
बसी है जिसमे अजनबी साँसे,
मुबारक हो, वो उजाले,
वो आँगन, वो सितारे,
उन्हें, जो अब नही हमारे...
जब रंगीनिया दामन छोड़ दें,
पास ना हो कोई,
बुला लेना हमें,
खिदमत में हाज़िर होंगे,
आज़माँ लेना कभीभी,
जब कभी पड़ जाओ अकेले....
ये रहे वादे हमारे,
अमादा रहेंगे इनपे,
जीते जी हमारे.....
शमा...जो जली हरदम अकेली....
नयी चाँदनी, आँगन नए,
हर शाम लबोंके जाम नए,
जिस्म नए, हरवक्त नयी बाहें,
इक रातकी बदरीसे डरके,
जो तलाशे उजाले नए,
उम्र गुजार देंगे अमावस में ,
ऐसे चाँदकी नही जुस्तजू हमें...
कृष्ण पक्षके के स्याह अंधेरे
बने रहनुमा हमारे,
कई राज़ डरावने,
आ गए सामने, बन नजारे,
बंद चश्म खोल गए,
सचके साक्षात्कार हो गए,
हम उनके शुक्रगुजार बन गए...
बेहतर हैं यही साये,
जिसमे हम हो अकेले,
ना रहें ग़लत मुगालते,
मेहेरबानी, ये करम
बड़ी शिद्दतसे वही कर गए,
चाहे अनजानेमे किए,
हम आगाह तो हो गए....
जो नही थे माँगे हमने,
दिए खुदही उन्होंने वादे,
वादा फरोशी हुई उन्हीसे,
बर्बादीके जश्न खूब मने,
ज़ोर शोरसे हमारे आंगनमे...
इल्ज़ाम सहे हमीने...
ऐसेही नसीब थे हमारे....
अब न रहे कोई शिकवे,
बेहतर हैं यही साये,
जिनमे हम हो अकेले,
गंध आती है, उस उतरन में,
बसी है जिसमे अजनबी साँसे,
मुबारक हो, वो उजाले,
वो आँगन, वो सितारे,
उन्हें, जो अब नही हमारे...
जब रंगीनिया दामन छोड़ दें,
पास ना हो कोई,
बुला लेना हमें,
खिदमत में हाज़िर होंगे,
आज़माँ लेना कभीभी,
जब कभी पड़ जाओ अकेले....
ये रहे वादे हमारे,
अमादा रहेंगे इनपे,
जीते जी हमारे.....
शमा...जो जली हरदम अकेली....
Tuesday, April 14, 2009
अंधेरों की खैर हो....
'तनहा' उदास रात के लमहों की खैर हो
इक शम्म जल उठी है अंधेरों की खैर हो
बैठे हैं इंतज़ार में लौटेंगे वो कभी
बरसों की बात छोड़िये सदियों की खैर हो
होठों पे एक बात है होती नहीं बयाँ
सोचा है आज कह भी दें लफ़्ज़ों की खैर हो
उनको छुआ कि जिस्म को बिजली ने छू लिया
देखा है उनको बारहा आंखों की खैर हो
मौजों से आज हो गयी तूफाँ की दोस्ती
दरिया है बेलगाम किनारों की खैर हो
-- प्रमोद कुमार कुश 'तनहा'
Mai Pramodjee kee behad shukrguzaar hun, ki ,unhonne ye gazal mujhe apne blogpe copy, paste karnekee ijaazat dee....unkee behtareen rachnaonmese mujhe ye ek lagee thee...sheershak maine apneaap de diya hai...aashaa kartee hun, ki unhen aitaraaz nahee hoga...
इक शम्म जल उठी है अंधेरों की खैर हो
बैठे हैं इंतज़ार में लौटेंगे वो कभी
बरसों की बात छोड़िये सदियों की खैर हो
होठों पे एक बात है होती नहीं बयाँ
सोचा है आज कह भी दें लफ़्ज़ों की खैर हो
उनको छुआ कि जिस्म को बिजली ने छू लिया
देखा है उनको बारहा आंखों की खैर हो
मौजों से आज हो गयी तूफाँ की दोस्ती
दरिया है बेलगाम किनारों की खैर हो
-- प्रमोद कुमार कुश 'तनहा'
Mai Pramodjee kee behad shukrguzaar hun, ki ,unhonne ye gazal mujhe apne blogpe copy, paste karnekee ijaazat dee....unkee behtareen rachnaonmese mujhe ye ek lagee thee...sheershak maine apneaap de diya hai...aashaa kartee hun, ki unhen aitaraaz nahee hoga...
Thursday, April 9, 2009
मेरे सफरके हमसफ़र...
हम कभी रूठते न थे,
मनाना आता नही उन्हें,
बखूबी जानते थे !
ताउम्र वो रूठे रहे,
हमारी हर अदासे
हम उन्हें मनाते रहे !
हम फिरभी नही रूठे.....
वो हमसफ़र मेरे, सफ़र के
हर मोड़पे मुँह मोडके,
चलतेही गए, निकलके आगे,
हम दामन पसारते रहे,
चश्म बेसब्र रोते रहे,
मुरझाये लब मुस्कुराते रहे,
हम कभी ना रूठे.....
अपनीही बाहोंमे सिमटे रहे,
कभी एक क़दम भी साथ चले?
पूछती रहीं हरवक्त हमसे,
सिसकती सुनसान राहे,
ना, ना, ना कहो ऐसे,
हम जवाबमे नकारते रहे,
हम रूठे, पर खुदसे...
की ना की हर ख़ता के,
इल्ज़ाम उम्रभर, सहते रहे,
चाहते तो रूठते उनपे,
पर हम तो निसार थे,
उन्हीपे ,जो हमें हमारे,
सबकुछ लगे थे,
कैसे नही समझे,
के, हम उनके क्या थे?
रूठते तोभी क्या पाते...?
कठपुतली बँधी खूँटी से,
जिसे वो नचाते रहे?
सिर्फ़ यही थे उनके लिए?
बेखब्र ख़याल आते रहे,
बेसाख्ता सवाल उठते गए,
बेदर्द मौसम बदलते गए,
हम उन्हें बुलातेही गए,
ख़ुद को ख़ुद ही मनाते रहे....
अब छाई हैं खिजाएँ, ,
मीलों रूखे बियाबाँमे ,
कभी आयीं थी बहारें?
जो देती हो सदायें?
उजडे बूटे, सूखे पत्ते,
बेज़ुबाँ, सब बेचारे,
करते रहे इशारे,
अब क्या तो रूठें,
क्या तो मनाएँ उन्हें??
मनाना आता नही उन्हें,
बखूबी जानते थे !
ताउम्र वो रूठे रहे,
हमारी हर अदासे
हम उन्हें मनाते रहे !
हम फिरभी नही रूठे.....
वो हमसफ़र मेरे, सफ़र के
हर मोड़पे मुँह मोडके,
चलतेही गए, निकलके आगे,
हम दामन पसारते रहे,
चश्म बेसब्र रोते रहे,
मुरझाये लब मुस्कुराते रहे,
हम कभी ना रूठे.....
अपनीही बाहोंमे सिमटे रहे,
कभी एक क़दम भी साथ चले?
पूछती रहीं हरवक्त हमसे,
सिसकती सुनसान राहे,
ना, ना, ना कहो ऐसे,
हम जवाबमे नकारते रहे,
हम रूठे, पर खुदसे...
की ना की हर ख़ता के,
इल्ज़ाम उम्रभर, सहते रहे,
चाहते तो रूठते उनपे,
पर हम तो निसार थे,
उन्हीपे ,जो हमें हमारे,
सबकुछ लगे थे,
कैसे नही समझे,
के, हम उनके क्या थे?
रूठते तोभी क्या पाते...?
कठपुतली बँधी खूँटी से,
जिसे वो नचाते रहे?
सिर्फ़ यही थे उनके लिए?
बेखब्र ख़याल आते रहे,
बेसाख्ता सवाल उठते गए,
बेदर्द मौसम बदलते गए,
हम उन्हें बुलातेही गए,
ख़ुद को ख़ुद ही मनाते रहे....
अब छाई हैं खिजाएँ, ,
मीलों रूखे बियाबाँमे ,
कभी आयीं थी बहारें?
जो देती हो सदायें?
उजडे बूटे, सूखे पत्ते,
बेज़ुबाँ, सब बेचारे,
करते रहे इशारे,
अब क्या तो रूठें,
क्या तो मनाएँ उन्हें??
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चाहना हक नहीं उल्फत ,मुहब्बत तो है मिट जाना
बाँटना मुस्कुराहट ही ,फकत चाहत का पैमाना
जमाने के लिए रोता , जमाने लिए हंसता
मजहब जिसका मुहब्बत है जमाने के लिए मरता
उम्मीदें जिसने पालीं हैं ,वही गमगीन होता है
जिसे तुम आजमाओगे, वही टूटेगा पैमाना
खोल लो दिल के दरवाजे ,हवाओं को गुजरने दो
अंदेशे तो सदा होंगे ,उन्हें भी वार करने दो
सच्चाई जान लेने दो , गुरुर ऐ बद गुमानी को,
वो चाहत ख्वाब है याफ़िर दिलेवहशत का अफसाना