कुछ अरसा हुआ
एक तूफाँ मिला,
ज़िंदगी के निशाँ
पूरी तरह मिटा गया,
जब वो थम गया,
जीवन के कयी
भेद खोल गया!
कुछ अरसा हुआ...
कल के बारेमे
आगाह कर गया !
हर तूफाँ से हर बार
खुद ही निपटना होगा
तूफाँ समझा गया!
कुछ अरसा हुआ॥
फिर तो कयी तूफाँ
लेकर निशाँ , आये गए,
सैकड़ों बरबादियाँ,
बार, बार छोड़ गए
हरबार मुझे भी,
चूर,चूर कर गए
दोस्त नही आए,
ऐसे तूफाँ आए गए...
पर हर बार फिर से
वही बात दोहरा गए,
अकेलेही चलना है तुम्हें
तूफाँ कान मे सुना गए...
लौटने का वादा निभाते रहे..
तूफाँ आते रहे...आते रहे..
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Tuesday, July 28, 2009
Saturday, April 18, 2009
नही जुस्तजू हमें....
जिसे हर रात चाहिए
नयी चाँदनी, आँगन नए,
हर शाम लबोंके जाम नए,
जिस्म नए, हरवक्त नयी बाहें,
इक रातकी बदरीसे डरके,
जो तलाशे उजाले नए,
उम्र गुजार देंगे अमावस में ,
ऐसे चाँदकी नही जुस्तजू हमें...
कृष्ण पक्षके के स्याह अंधेरे
बने रहनुमा हमारे,
कई राज़ डरावने,
आ गए सामने, बन नजारे,
बंद चश्म खोल गए,
सचके साक्षात्कार हो गए,
हम उनके शुक्रगुजार बन गए...
बेहतर हैं यही साये,
जिसमे हम हो अकेले,
ना रहें ग़लत मुगालते,
मेहेरबानी, ये करम
बड़ी शिद्दतसे वही कर गए,
चाहे अनजानेमे किए,
हम आगाह तो हो गए....
जो नही थे माँगे हमने,
दिए खुदही उन्होंने वादे,
वादा फरोशी हुई उन्हीसे,
बर्बादीके जश्न खूब मने,
ज़ोर शोरसे हमारे आंगनमे...
इल्ज़ाम सहे हमीने...
ऐसेही नसीब थे हमारे....
अब न रहे कोई शिकवे,
बेहतर हैं यही साये,
जिनमे हम हो अकेले,
गंध आती है, उस उतरन में,
बसी है जिसमे अजनबी साँसे,
मुबारक हो, वो उजाले,
वो आँगन, वो सितारे,
उन्हें, जो अब नही हमारे...
जब रंगीनिया दामन छोड़ दें,
पास ना हो कोई,
बुला लेना हमें,
खिदमत में हाज़िर होंगे,
आज़माँ लेना कभीभी,
जब कभी पड़ जाओ अकेले....
ये रहे वादे हमारे,
अमादा रहेंगे इनपे,
जीते जी हमारे.....
शमा...जो जली हरदम अकेली....
नयी चाँदनी, आँगन नए,
हर शाम लबोंके जाम नए,
जिस्म नए, हरवक्त नयी बाहें,
इक रातकी बदरीसे डरके,
जो तलाशे उजाले नए,
उम्र गुजार देंगे अमावस में ,
ऐसे चाँदकी नही जुस्तजू हमें...
कृष्ण पक्षके के स्याह अंधेरे
बने रहनुमा हमारे,
कई राज़ डरावने,
आ गए सामने, बन नजारे,
बंद चश्म खोल गए,
सचके साक्षात्कार हो गए,
हम उनके शुक्रगुजार बन गए...
बेहतर हैं यही साये,
जिसमे हम हो अकेले,
ना रहें ग़लत मुगालते,
मेहेरबानी, ये करम
बड़ी शिद्दतसे वही कर गए,
चाहे अनजानेमे किए,
हम आगाह तो हो गए....
जो नही थे माँगे हमने,
दिए खुदही उन्होंने वादे,
वादा फरोशी हुई उन्हीसे,
बर्बादीके जश्न खूब मने,
ज़ोर शोरसे हमारे आंगनमे...
इल्ज़ाम सहे हमीने...
ऐसेही नसीब थे हमारे....
अब न रहे कोई शिकवे,
बेहतर हैं यही साये,
जिनमे हम हो अकेले,
गंध आती है, उस उतरन में,
बसी है जिसमे अजनबी साँसे,
मुबारक हो, वो उजाले,
वो आँगन, वो सितारे,
उन्हें, जो अब नही हमारे...
जब रंगीनिया दामन छोड़ दें,
पास ना हो कोई,
बुला लेना हमें,
खिदमत में हाज़िर होंगे,
आज़माँ लेना कभीभी,
जब कभी पड़ जाओ अकेले....
ये रहे वादे हमारे,
अमादा रहेंगे इनपे,
जीते जी हमारे.....
शमा...जो जली हरदम अकेली....
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