Showing posts with label राज़. Show all posts
Showing posts with label राज़. Show all posts

Friday, October 15, 2010

स्याह अंधेरे..



कृष्ण पक्षके के स्याह अंधेरे
बने रहनुमा हमारे,
कई राज़ डरावने,
आ गए सामने, बन नज़ारे,
बंद चश्म खोल गए,
सचके साक्षात्कार हो गए,
हम उनके शुक्रगुजार बन गए...

बेहतर हैं यही साये,
जिसमे हम हो अकेले,
ना रहें ग़लत मुगालते,
मेहेरबानी, ये करम
बड़ी शिद्दतसे वही कर गए,
चाहे अनजानेमे किए,
हम आगाह तो हो गए....

जो नही थे माँगे हमने,
दिए खुदही उन्होंने वादे,
वादा फरोशी हुई उन्हीसे,
बर्बादीके जश्न खूब मने,
ज़ोर शोरसे हमारे आंगनमे...
इल्ज़ाम सहे हमीने...
ऐसेही नसीब थे हमारे....

Sunday, August 1, 2010

हमारी आँखें..

ना,ना,न झाँको इनमे,
बहुत बोलती हैं हमारी आँखें,
लब चाहे झूठ बोल जाएँ,
चुगलबाज़ हैं हमारी आँखें..
कुछ राज़ हैं गहरे,गहरे ,
जिन्हें खोलती हैं हमारी आँखें..

Friday, April 16, 2010

स्याह अंधेरे..


कृष्ण पक्षके के स्याह अंधेरे
बने रहनुमा हमारे,
कई राज़ डरावने,
आ गए सामने, बन नज़ारे,
बंद चश्म खोल गए,
सचके साक्षात्कार हो गए,
हम उनके शुक्रगुजार बन गए...

बेहतर हैं यही साये,
जिसमे हम हो अकेले,
ना रहें ग़लत मुगालते,
मेहेरबानी, ये करम
बड़ी शिद्दतसे वही कर गए,
चाहे अनजानेमे किए,
हम आगाह तो हो गए....

जो नही थे माँगे हमने,
दिए खुदही उन्होंने वादे,
वादा फरोशी हुई उन्हीसे,
बर्बादीके जश्न खूब मने,
ज़ोर शोरसे हमारे आंगनमे...
इल्ज़ाम सहे हमीने...
ऐसेही नसीब थे हमारे....

Monday, August 31, 2009

बाज़ारे आम...

उस राज़ को क्या राज़ कहें,
जो चौराहों पे सरे आम हो?
जो 'राज़' हमारे पहलू में है,
वो हर गलीमे हो,उसे क्या कहें?
यही के,जो ख़ुद को 'ख़ास' कहें,
वो बाज़ारे आम से दूर रहें?
छवी ,जो उनकी हमारी आँखों में है,
वही रखें,उसे क्यों गिराएँ हैं?