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Friday, April 16, 2010

स्याह अंधेरे..


कृष्ण पक्षके के स्याह अंधेरे
बने रहनुमा हमारे,
कई राज़ डरावने,
आ गए सामने, बन नज़ारे,
बंद चश्म खोल गए,
सचके साक्षात्कार हो गए,
हम उनके शुक्रगुजार बन गए...

बेहतर हैं यही साये,
जिसमे हम हो अकेले,
ना रहें ग़लत मुगालते,
मेहेरबानी, ये करम
बड़ी शिद्दतसे वही कर गए,
चाहे अनजानेमे किए,
हम आगाह तो हो गए....

जो नही थे माँगे हमने,
दिए खुदही उन्होंने वादे,
वादा फरोशी हुई उन्हीसे,
बर्बादीके जश्न खूब मने,
ज़ोर शोरसे हमारे आंगनमे...
इल्ज़ाम सहे हमीने...
ऐसेही नसीब थे हमारे....

Saturday, November 7, 2009

ख़ूब नज़ारे थे!

क्या ख़ूब नज़ारे थे !
चश्मदीद गवाह बन गए,
अपनी ही मौत के,मारे गए,
बेमौत,वो कितने खुश हुए,
अर्थी में काँधे न लगे,
हम ज़िंदा लाश थे !