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Friday, October 15, 2010

स्याह अंधेरे..



कृष्ण पक्षके के स्याह अंधेरे
बने रहनुमा हमारे,
कई राज़ डरावने,
आ गए सामने, बन नज़ारे,
बंद चश्म खोल गए,
सचके साक्षात्कार हो गए,
हम उनके शुक्रगुजार बन गए...

बेहतर हैं यही साये,
जिसमे हम हो अकेले,
ना रहें ग़लत मुगालते,
मेहेरबानी, ये करम
बड़ी शिद्दतसे वही कर गए,
चाहे अनजानेमे किए,
हम आगाह तो हो गए....

जो नही थे माँगे हमने,
दिए खुदही उन्होंने वादे,
वादा फरोशी हुई उन्हीसे,
बर्बादीके जश्न खूब मने,
ज़ोर शोरसे हमारे आंगनमे...
इल्ज़ाम सहे हमीने...
ऐसेही नसीब थे हमारे....

Thursday, June 3, 2010

मन

कभी मन इतना -सा ,
जैसे खश खश का दाना !

कभी मन इतना बड़ा,
आसमाँ समाके रीता पड़ा!

आँख ना इससे चुराना,
मन हर वक़्त आईना!

मानो तो मन ही रहनुमा,
इसका कहा ना टालना!