Thursday, June 3, 2010

मन

कभी मन इतना -सा ,
जैसे खश खश का दाना !

कभी मन इतना बड़ा,
आसमाँ समाके रीता पड़ा!

आँख ना इससे चुराना,
मन हर वक़्त आईना!

मानो तो मन ही रहनुमा,
इसका कहा ना टालना!

11 comments:

arvind said...

आँख ना इससे चुराना,
मन हर वक़्त आईना!
.....bahut khub.

संजय भास्‍कर said...

...कुछ अलग और बेहतरीन

vandan gupta said...

तोरा मन दर्पण कहलाये……………सब देखता है ये मन्…………इससे कब क्या छुप पाया है………………सुन्दर प्रस्तुति।

रश्मि प्रभा... said...

mann ki alag alag gati.... badhiyaa

कडुवासच said...

...बहुत सुन्दर !!!

ktheLeo (कुश शर्मा) said...

वाह कमाल की बात कह दी आपने!मन कभी ’मन भर’ ,कभी सिर्फ़ माशा!.

Sorry for delayed comment.In fact I was travelling since 22 May,(in Poona as of now till 8th),hence could not check the blog.

Kuldeep Saini said...

man aisa hi hota hai khoob pesh kiya aapne

वीरेंद्र सिंह said...

Sahi likha hai dost........Nice piece of writing.

दिगम्बर नासवा said...

मानो तो मन ही रहनुमा,
इसका कहा ना टालना ..

मन तो वैसे भी मन मौजी है ... इसका कहा मान लेना चाहिए ....

Anonymous said...

man hi to hai..........
amazing thoughts!

Anonymous said...

man hi to hai..........
amazing thoughts!