'प्लीज़' "कविता" पर भी! क्यों नहीं!
इस बार ऐसा करना,
जब बिना बताये आओ,
किसी दिन
तो
चुपचाप
चुरा कर ले जाना,
जो कुछ भी,
तुम्हें लगे,
कीमती,
मेरे घर,
जेहन,
या शख्शियत में,
प्लीज़!
गर ये भी न हो पाया,
तो ,
मैं,
टूट जाउंगा,
क्यों कि सुना है,
मुफ़लिसी
इन्सान को
खोखला कर देती है!
