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Wednesday, May 5, 2010

प्लीज़!

'प्लीज़' "कविता" पर भी! क्यों नहीं! 

इस बार ऐसा करना,

जब बिना बताये आओ,

किसी दिन

तो 
चुपचाप
चुरा कर ले जाना,

जो कुछ भी,
तुम्हें लगे,
कीमती,

मेरे घर,
जेहन,
या शख्शियत में,

प्लीज़!

गर ये भी न हो पाया,

तो ,
मैं,

टूट जाउंगा,

क्यों कि सुना है,

मुफ़लिसी 

इन्सान को

खोखला कर देती है!

Tuesday, May 4, 2010

एक बार फ़िर "कविता" पर, बस कह दिया!

चमन को हम साजाये बैठे हैं,
जान की बाज़ी लगाये बैठे हैं.

तुम को मालूम ही नहीं शायद,
दुश्मन नज़रे गडाये बैठे हैं.

सलवटें बिस्तरों पे रहे कायम,
नींदे तो हम गवांये बैठें हैं

फ़ूल लाये हो तो गैर को दे दो,
हम तो दामन जलाये बैठे हैं.

मयकदे जाते तो गुनाह भी था,
बिन पिये सुधबुध गवांये बैठे हैं.

सच न कह्ता तो शायद बेह्तर था,
सुन के सच मूंह फ़ुलाये बैठे हैं.