Friday, July 17, 2009

दिया और बाती...!

रिश्ता था हमदोनोका ऐसा अभिन्न न्यारा
घुलमिल आपसमे,जैसा दिया और बातीका!
झिलमिलाये संग,संग,जले तोभी संग रहा,
पकड़ हाथ किया मुक़ाबला तूफानोंका !
बना रहा वो रिश्ता प्यारा ,न्यारा...

वक़्त ऐसाभी आया,साथ खुशीके दर्दभी लाया,
दियेसे बाती दूर कर गया,दिया रो,रो दिया,
बन साया,उसने दूरतलक आँचल फैलाया,
धर दी बातीपे अपनी शीतल छाया,कर दुआ,
रहे लौ सलामत सदा,दियेने जीवन वारा!!

जीवनने फिर एक अजब रंग दिखलाया,
आँखोंमे अपनों की, धूल फेंक गया,
बातीने तब सब न्योछावर कर अपना,
दिएको बुझने न दिया, यूँ निभाया रिश्ता,
बातीने दियेसे अपना,अभिन्न न्यारा प्यारा,


तब उठी आँधी ऐसी,रिश्ताही भरमाया
तेज़ चली हवा तूफानी,कभी न सोचा था,
गज़ब ऐसा ढा गया, बना दुश्मन ज़माना,
इन्तेक़ाम की अग्नी में,कौन कहाँ पोहोंचा!
स्नेहिल बाती बन उठी भयंकर ज्वाला!

दिएको दूर कर दिया,एक ऐसा वार कर दिया,
फानूस बने हाथोंको दियेके, पलमे जला दिया!
कैसा बंधन था,ये क्या हुआ, हाय,रिश्ता नज़राया!
ज़ालिम किस्मत ने घाव लगाया,दोनोको जुदा कर दिया,
ममताने उसे बचाना चाहा, आँचल में छुपाना चाहा!!

बाती धधगती आग थी, आँचल ख़ाक हो गया,
स्वीकार नही लाडली को कोई आशीष,कोई दुआ,
दिया, दर्दमे कराह जलके ख़ाक हुआ,भस्म हुआ,
उस निर्दयी आँधीने एक माँ का बली चढाया,
बलशाली रिश्तेका नाज़ ख़त्म हुआ, वो टूट गया...

रिश्ता तेरा मेरा ऐसा लडखडाया, टूटा,
लिए आस, रुकी है माया, कभी जुडेगा,
अन्तिम साँसोसे पहले, साथ हों , बाती दिया,
और ज़ियादा क्या माँगे, वो दिया?
बने एकबार फिर न्यारा,रिश्ता,तेरा मेरा?

कुछ ऐसा ही रिश्ता रहा मेरा और बेटी का...! कभी मै बेटी बनी उसकी,वो बनी माँ....

'संस्मरणों' में इसे लिखा है...

4 comments:

Vinay said...

बहुत उत्तेजना है कविता में!
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Neeraj Kumar said...

रिश्ता तेरा मेरा ऐसा लडखडाया, टूटा,
लिए आस, रुकी है माया, कभी जुडेगा,
अन्तिम साँसोसे पहले, साथ हों , बाती दिया,
और ज़ियादा क्या माँगे, वो दिया?
बने एकबार फिर न्यारा,रिश्ता,तेरा मेरा?

सुन्दर और उससे भी सुन्दर निचे की ये पंक्तियाँ...
...कुछ ऐसा ही रिश्ता रहा मेरा और बेटी का...! कभी मै बेटी बनी उसकी,वो बनी माँ....

वन्दना अवस्थी दुबे said...

प्यार और क्षोभ की जावन्त वानगी है आपकी ये रचना.

vandan gupta said...

gahre bhav vyakt karti rachna.