घनी छाँव रोकती रही ..
कड़ी धूप बुलाती रही ,
हम धूप में चल दिए ,
दरख्तोंके साये छोड़ दिए
रुकना मुमकिन न था ,
चलना पड़ ही गया ..
कौन ठहरा यहाँ ?
अपनी भी मजबूरी थी ..
इक गाँव बुलाता रहा,
एक सफ़र जारी रहा..
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Wednesday, March 24, 2010
Wednesday, August 12, 2009
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