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Saturday, March 20, 2010

दिलकी राहें.......

बहोत वक़्त बीत गया,
यहाँ किसीने दस्तक दिए,
दिलकी राहें सूनी पड़ीं हैं,
गलियारे अंधेरेमे हैं,
दरवाज़े हर सरायके
कबसे बंद हैं !!
राहें सूनी पडी हैं॥

पता नही चलता है
कब सूरज निकलता है,
कब रात गुज़रती है,
सुना है, सितारों भरी ,
होतीं हैं रातें भी
राहें सूनी पड़ीं..

चाँद भी घटता बढ़ता है,
शफ़्फ़ाक़ चाँदनी, रातों में,
कई आँगन निखारती है,
यहाँ दीपभी जला हो,
ऐसा महसूस होता नही....
दिलकी राहें सूनी पड़ीं...

उजाले उनकी यादोंके,
हुआ करते थे कभी,
अब तो सायाभी नही,
ज़माने गुज़रे, युग बीते,
इंतज़ार ख़त्म होगा नही...
दिलकी राहें सूनी पड़ीं....


यहाँ होगी रहगुज़र कोई,
राहें, रहेंगी सूनी,सूनी,
कौन समझाए उसे?
कौन कहेगा उसे?
वो किसीका सुनती नही.....
सूनी राहों को तकती रहती...

Tuesday, November 24, 2009

जल उठी" शमा....!"

शामिले ज़िन्दगीके चरागों ने
पेशे खिदमत अँधेरा किया,
मैंने खुदको जला लिया!
रौशने राहोंके ख़ातिर ,
शाम ढलते बनके शमा!
मुझे तो उजाला न मिला,
सुना, चंद राह्गीरोंको
हौसला ज़रूर मिला....
अब सेहर होनेको है ,
ये शमा बुझनेको है,
जो रातमे जलते हैं,
वो कब सेहर देखते हैं?

Saturday, September 12, 2009

एक आहट..

दूर कहीँ आहट हुई,
लगा ,गुज़रा कोई,
दिलकी राहों पे दस्तक हुई,
लगा गुज़रा कोई,

दिलने धीरेसे द्वार खोला,
ना राही न परिंदा!
कोई कहीँ नही था!
ये कौन गुज़रा था?

मुझे ये क्या हुआ?
ये महसूस हुआ?
इस सवाल का
जवाब कोई होगा?

Monday, June 8, 2009

जल उठी" शमा....!"

शामिले ज़िन्दगीके चरागों ने
पेशे खिदमत अँधेरा किया,
किया तो क्या हुआ?
मैंने खुदको जला लिया!
रौशने राहोंके ख़ातिर ,
शाम ढलते बनके शमा!
मुझे तो उजाला न मिला,
ना मिला तो क्या हुआ?
सुना, चंद राह्गीरोंको
हौसला ज़रूर मिला....
अब सेहर होनेको है ,
ये शमा बुझनेको है,
जो रातमे जलते हैं,
वो कब सेहर देखते हैं?

शमा

ये एक पुरानी पोस्ट है, जिसे दोबारा पोस्ट कर रही हूँ.....

Wednesday, April 8, 2009

दरख्तोंके साये ....

दरख्तोंके साए ठंडे, ठंडे,
रुको, रुको कहते गए,
राहों पे खडी धूप कड़ी,
राह चलने कहती गयी,
बार, बार बुलाती रही,
हम ज़ालिम धूपमे चल पड़े,
दरख्तों के साए रोकते गए,

सख्त राहोंपे चलके,
पैरोंके छाले दुखते गए
तब कितने याद आए,
वो प्यारके साए,
जो रोकते रहे थे!

वो बाहोंके सिरहाने ,
बेहद याद आए,
वो दर्खतोंके तने,
कितने याद आए!
दूरतक हमें बुलाते रहे!

एक दिन थकके
सोंचा मुड़ जाएँ,
किस लिए चलें आगे!
पूछा राह्गीरोंसे
जो पीछेसे आए,
क्या दरख्त बुलाते हमें?

वो कहने लगे,
चले चलो आगे,
वो दरख्त नही रहे,
कैसे मिलेंगे साए?
पुकारनेवाले नही रहे !

किस्मत होगी तो मिलेंगे
तपते रेगिस्तानोमे तुम्हें,
बहरोंके लुभावन साए,
तनहा, तनहा चलते गए,
कहीं नही मिले वो साए!
दरख्त याद आते रहे!

जिन्हें हम पीछे छोड़ आए,
वो बोहोत याद आए
साए वैसे फिर नही मिले,
गुज़री आंधियोंमे
वो दम तोड़ गए!
दरख्त हमें छोड़ गए...!

Sunday, March 22, 2009

दिलकी राहें.........

बोहोत वक़्त बीत गया,
यहाँ किसीने दस्तक दिए,
दिलकी राहें सूनी पड़ीं हैं,
गलियारे अंधेरेमे हैं,
दरवाज़े हर सरायके
कबसे बंद हैं !!
पता नही चलता है
कब सूरज निकलता है,
कब रात गुज़रती है,
सुना है, सितारों भरी ,
रातें भी होतीं हैं!
चाँद भी घटता बढ़ता है,
शफ्फाक चांदनी, रातों में,
कई आँगन निखारती है,
यहाँ दीपभी जला हो,
ऐसा महसूस होता नही....
उजाले उनकी यादोंके,
हुआ करते थे कभी,
अब तो सायाभी नही,
ज़माने गुज़रे, युग बीते,
इंतज़ार ख़त्म होगा नही...
कौन समझाए उसे?
वो किसीका सुनती नही.....

शमा