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Thursday, July 12, 2012

संवेदनहीन




अतृप्त आत्मा ,












भूखे शरीर और उसकी ज़रूरतें तमाम,


मन बेकाबू,






और उसकी गति बे-लगाम,


अधूरा सत्य,


धुन्धले मंज़र सुबुह शाम,



क्या पता? कब और कैसे आये मुकम्मल सुकूं,


और रूह को आराम!



Monday, September 6, 2010

वो कसक भी नही....

ऐसा नही कि तुम्हें हम से मुहब्बत नही ,
ये भी सच है कि, दिल में तुम्हारे, हमारे लिए,
पहली-सी अहमियत नही,वो कसक भी नही।

हज़ार वादे किये कि मिलेंगे वहीँ कहीँ,
ना मिलने की कोई वजह भी कही नही,
हमने इंतज़ार किया इसकी परवाह नही?

किसी दोराहे पे आप खड़े तो नही?
मोड़ लेना चाहते हो,कहते क्यों नही?
मेरी राह से तुम्हारी रहगुज़र मुमकिन नही?