ये रचना, "Leo" जी के ख़ातिर पोस्ट कर रही हूँ...
उनकी एक रचना पढने के बाद मुझे मेरे अल्फाज़ याद आ गए..उनकी रचना से कोई तुलना नही क्योंकि, वो अतुल्य हैं...
"leo" सही मायनेमे रचनाकार हैं...और मुझे किसी "छंद" का ज्ञान नही...!
बेलगाम,तूफानी दरिया था,
कश्तीको उसमे बहा दिया,
सँग मँझधार, भँवर मिला !
डरे-से साहिलोंको देखा,
मूँदी आँखें,पतवार फेंका,
के, समंदर बुला रहा था!
उफ़ !क्या गज़ब ढा गया !
थी साज़िश, या तमाशा!
बहता दरिया, सूख गया!
साहिल,ना समंदर मिला,
दूर खडा, बेदर्द किनारा,
देख मुझे, मुस्काता रहा!
आँखोंसे सैलाब माँगा,
हाथ उठाके, की दुआ,
खुदाको मंज़ूर ना हुआ!
सुकूँ मिला,न किनारा,
बस दश्तो सेहरा मिला,
खुदाया! ये क्यों हुआ?
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Tuesday, May 26, 2009
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